Sunday, December 9, 2012

शब्द सक्रिय हैं: सुनना केवल तुम

शब्द सक्रिय हैं: सुनना केवल तुम

तेरा प्यार...

रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार
बदन की खुशबु,
बालों की महक
अनबोले लम्बे कथन
अनचाही चहक
वह रुदन
कोशीश हँसने की
कुछ सौदेबजी
लम्बी खामोशी
बातें तन्हाई की
रातों की मस्ती
ढल था हुआ आंचल
तेज सांसों की
सीने पर हलचल
बिन सावन बरसे बादल
रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार

:-सजन कुमार मुरारका

Sunday, December 2, 2012

तुम एक पत्नी हो !!?

तुम एक पत्नी हो !!?
कभी एकांत के क्षण मे,
निश्चुप, परिवेश मे,
गहराई से,शांती से,
सोचता हूँ :-
जीवन भर साथ देने;
की थी प्रतिज्ञा,
दुःख सुख साथ निभाने,
पर तुम !!
हरदम डरी सी,
शरमाई सी,
अपने आँचल में,
छिपाती सब बातें,
और अपनी गृहस्थी संभाले;
बन गई सब की दासी |
मूर्खा, सोच नहीं पायी,
परम्पराएं,, रीति,रिवाज;
इन्हें सत्य समझ !
जान ही नहीं पायी कि...
जिस बंधन में बंध कर,
जो सहती हो -
एक तरफ़ा निभाके,
अपने को सौभाग्यशाली,
समझने मे,
तुम्हारी बड़ी भुल है |
क्योंकि हर नियम,
तुम पर लागु थे,!
मैं एक पुरुष,
पुरुष-प्रधान व्यवस्था मे,
फूलों का अधिकारी!
काँटों कि चुभन से बचता,
खुश्बू से मदहोश;
शायद ही तुम्हारी पीड़ा समझता !|!
और जिस दिन ...
मैंने यह दुःख समझा,
चुभने लगे कांटे से |
लेकिन ..ऐसा कभी हो ना पाया ...
अनुभूति होने के बाद भी,
खुले मन से,
अभिव्यक्त कर पाने मे,
असमर्थ रहा |
फ़ैला था मेरा संसार दूर तक,
उस अवस्था मे,
संकोच और झूटे अभिमान से;
चुप-चाप देखता,
मन मे थे सपने अनेक,
और उन सपनों को,
कई कई प्रकार से,
कविता मे छुपाकर;
मैं कहता:-
विवेक दंशन से,
तुम्हारे सोने के बाद,
कविता का सहारे,
और मैं...सोचता हूँ !
तुमने पड़ा होगा मुझे,
मेरी कविताओं के जरिये,
अहम या पुरुष्वत-बोध मे;
अब कलेजे से,
तुम्हारी पीड़ा की गठरी लगाये ,
तुम्हारी नज़र से बचकर ,
आज उम्र के इस दौर पर !
मैं समझ पाया;
मै ने बस लेना ही जाना,
लेने में भोगा सुख,
क्योंकि तुम एक पत्नी थी !
और मैं पति |
जिसके कारण तुम सौभाग्यवती,
सीता जैसी पतिव्रता,
मर्यदा मे रहने वाली स्त्री!
और मैं पति | सिर्फ़ पति |

सजन कुमार मुरारका

" पत्नी और कविता -कैसे साथ"

" पत्नी और कविता -कैसे साथ"
दोनो के प्रति है आसक्ती अति;
महानता नहीं,  है मेरी बिपत्ती !
किसी से तो एक नहीं सम्हलती,
हमारे गले तो दो-दो  आ पड़ी  ;D


लाज कैसे बचाये,दिमाग मे न आये,
एक साथ दो नावों की करली सवारी !
पत्नी जरूरत हमारी,कविता मन भाये;
साप-छछुंदर सी हालात हो गई  हमारी  ;)


कहते हम"पत्नी का साया है भारी"
जब सो जाती,तब कविता की बारी ;
पत्नी न देगी तो कौन देगा रोटी ?
पत्नी कहती कविता नहीं देगी रोटी !
;D

आसमान से गिरा,खज़ूर मे लटका !
धोबी का कुत्ता,न घर का-न घाट का |
बीबी और बाहर कविता के बीच :
फंस गये"सजन"दो पाटन के नीच !
:D

जंहा साबुत बचा न कोय,
अब  पछताये क्या होय !
यह दिल की लगी,दिल्लगी हों गई,
शौख-शौखमे अब आदत सी हो गई| :-[

कर सकते,गर आपका उपाय,
तो रहते सुखी,समझ तो आय!
घर मे बीबी और बाहर कविता,
गुलछर्रे उड़ाते, पता न चलता : ::)


छुपाये "कस्तुरी" दिल के अन्दर ;
"मृग"भ्रम मे,असलियत से बेखबर,
खुशबु फ़ैल जाती,छुपाये न छुपती ;
कस्तुरी ही मौत का कारण होती | ???


बात दुजी "जल्दी से सौतन नहीं सुहाती"
घर मे बीबी और बाहर कविता के पति,
महंगाई के ज़माने मे दो को कैसे पाले !
गुलछर्रे भी उड़ायें, पत्नी को भी सम्भाले | ???


बन्धुवर,अब सोच,क्यों करते यह उपाय;
दो-तलवार का डर,फिरभी मन को भाये,
हिम्मत कर,दोनों को साथ-साथ रखते !
पत्नी से प्यार,तभी गहरी रात मे लिखते !! :-*

पत्नी चाहती है रात का वक्त मेरा
कविता के लिये वक्त का बखेड़ा
पत्नी सोने तक रात का वक्त उसका
कविता का पुरा वक्त शेष रात का  ?
  >:(

सजन कुमार मुरारका

मेरी आप -बीती

मेरी आप -बीती

गुस्से मे लाल,
टमाटर जैसे गाल;
पत्नी बोली झुंझलाकर,
शर्म नहीं आती,
रात-रात ज़ागकर,
क्या-कया उठ-पटांग-
लिखते हो ?
कोई पडता भी नहीं!
खुद लिख,खुद खुश,
क्यों घरवालों को;
परेशान करते हो ?
इतना वक़्त,
इतनी लगन,
और काम मे देते ;
तो,दो पैसे घर मे आते!
कम से कम,
हम इज्जत से जीते।
जीना दुर्भर हो गया,
आस-पड़ोस की ;
औरतें जब करे सवाल!
हो जाते कान लाल।
कहती "तम्हारे"
"यह" क्या करते,
शर्म से गड़ जाती ।
सकुचाते कहती,
"कविता" करते !!
फिर भी वे दोहराती,
काम की बात बताओ?
कौशीश कर हार जाती ;
समझा नहीं पाती ।
तुम क्या काम करते हो ?
टिप्पणी मे हाय,
यों सुनने को पाये,
"बेकार" है !
"बीमार " निठ्ला"!!
काम का न काज़ का,
सो सेर अनाज़ का !!!
राम दुहाई ;
हम गहरी सोच मे,
क्या करे, कया ना करे!
इसी उधेड़वन मे,
लिख डाला ,
संदेश उनका ।
कहते हैं लोग,
हर महान पुरुष के,
पीछे होती कोई नारी !
हम पर पत्नी का ;
साया है भारी ।
लाज़ बचाना है दुस्वारी ,
मुस्किल हुवा ;
तय करना !
पत्नी प्यारी या,
कविता मेरी ।

सजन कुमार मुरारका

नशे की हालत मे, दिल की बात :-

नशे की हालत मे, दिल की बात :-

साकी मयखाने मे,छलकाती शबाब प्यालो मे,
पीलाये,  हो-ता नशा, मजा है नशे मे, पीने मे ।

नशा पीने का , और साकी को है - पिलाने का,
चढ़ती दिलो-दिमाग पे , आलम होता नशे का ।


खुशबू साकी की या प्याले की, महकता मयखाना;
रहती है दिलो दिमाग पे, दोनों की अदा छलकाना !


चमन मे फूल खिले,खुशबु फैलाये,और मुरझा जाते,
बहार आती,  दिल बहलाती,  चली जाती होले-होले!

डूबे चाहे जितना साकी मे,नशे मे, बैठ मयखाने मे,
मजा कभी भी पुरा न होता,हद होती, होश गवाने से ।

नशे  की खुमार, जीने के सामान, पिलाये जब साकी ;
पीके मजा,जीने की खुमार ,पीने की चाहत रहती बाकी।

जो नहीं पीते,उन्हें क्या पता,हम क्यों पीने को बेकरार;
लगता,कैसे जीते ?, जिसने साकी का किया नहीं दीदार!

कहते हमे "वह" तुम पीना छोड दो,जीना सीखो शान से,
कहते हम, पीओ तुम, जीना सीखो शान से, हर गम मे !


पीकर जीये,गम गलत किये ,नहीं,कंहा जी पाते ज़माने मे,
सब नशे मे जीते, उनका नशा रहता अलग-अलग भेष मे ।

किसी को धन का नशा,किसी को ताकत का या सत्ता का;
किसी को रूप का,किसी को मान-मर्यादा का या ज्ञान का !

कोई आधुनिकता मे, कोई रुड़ीवादी परम्पराओं मे जीता,
हर शख्स अपनी -अपनी सोच मे  मशगुल हो के रहता ।

धर्म के नाम पर, इन्सान जब, इन्सानियत का लहु पीता,
रोटी,कपड़ा के नाम पर बह्शी,नगां नचाके मोज़ जो करता!

कितने कितने तरह के नशे हैं,किस किस की बात करूँ !
देख हाल दुनिया का, अच्छा है,मैं मेरे पीने के नशे से मरुँ !!

:( :D :P
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नैतिक घोषणा :- यह कविता किसी को भी पीने के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है ,इसके बावज़ूद कोई अगर पीता है तो उसका पुर्ण उत्तरदायीत्व,पीनेवाले का खुद का होगा।लेखक,काब्यकोश या सम्बन्धित किसी की  कोई जवाबदेही नहीं होगी। यह घोषणा हर गलत काम करने के बाद, उस से  अपना पल्ला झाड़ने का एक संवेधानिक प्रक्रिया के तहत घोषित करने की आधुनिकतम उपाय मात्र है।
रही बात:-"नशे की हालत मे दिल की बात" की सो मैंने "लिखने" के नशे मे लिखी है। अत: किसी को भी मेरी बात से दु:ख पहुँचा हो तो,नशे के आलम मे कहा-सुनी मुवाफ़ करें और मन को साफ़ करें ।
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सजन कुमार मुरारका

यों ही..कुछ.बात या बेबात...(बेरुखी की)!!!

यों ही..कुछ.बात या बेबात...(बेरुखी की)!!!
अफ़साना यह रहता था,हर तरफ़ प्यार का मंज़र दिखा ;
फूलों से लदी हर शाख मे, मोहब्बत का वास्ता  दिखा !

केका गाई,मयूर नाचा,तितली उड़ी,मन मचल जाता था ;
भवंरेसे फिरते,गुन-गुनाते,चाँद-तारे तोड़ने का ज़ज्बा था !

मोहब्बत को रब जाना , प्रेम-प्यार को इबादत माना ;
मुस्कराहट पर मर मिटते,हर लहज़ा था मीठा-सुहाना !

क्या जाने क्या बात हुई,गुँजन सारे, बेज़ूवान हुवे ;
आँखों के नूर,अब उनकी आखों मे ही खटकने लगे !

वह लम्हा खोना नहीं चाहते थे , जब तुम्हारा साथ था ;
यह लम्हा जीना नहीं चाहते हैं ,जब तुम्हारा साथ छुटा !

तुम्हारी आँखें समझती थीं "दर्द", मेरा भी एक रिश्ता ऐसा !
तुम्हारी नफ़रत का दर्द,"दर्द" से मेरा रिश्ता भी एक ऐसा !


लबों पर था नाम तुम्हारा, मेरे लबों पर नाम है तुम्हारा ;
हिफ़ाजत से दिल मे था,हिफ़ाजत से रखने का दिल मेरा !

हर-रोज़ मिलने की आदत से,न मिलने का यह वीरान सा सफ़र,
ख्वाहिश है,अगर ना मिली तो, खत्म कर दूँ ज़िन्दगी का सफ़र !

सजन कुमार मुरारका

यों ही..कुछ... बात या बेबात.......(विडंबना की)!!!

यों ही..कुछ... बात या बेबात.......(विडंबना की)!!!

कई कई शाम उनके नाम हम ने,कई कई पैगाम लिखे थे,
कसमे ,वादे,इज़हार किया था उम्र भर का साथ निभाने;

प्यार जताने, पत्थर पर उनके साथ नाम जोड़कर लिखा था,
आरजू थी हर प्रेमी,सदीयों ही हमारे प्रेम की दास्ताँ देखेगा!!

हमे क्या पता था, बेज़ान पत्थर पर यों क्यों वक्त जाया क़रते,
"दिल"दार "बेदिल हुवे,पत्थर पर फिर लिखा था " प्यार मे";


पत्थर से भी शक्त, कौशीश हमने की थी बेकार मे,
पत्थर पर फिर भी लिखा हमने, प्यार के जनून मे;

उमीदों के बादल उड़ गये, हव़ा ने दिशा बदल दी ,
एक "ना" से उन्होंने  पूरी   कहानी ही बदल दी ;

प्यारके हर पल मे पुरी ज़िन्दगानी लिखी थी,
दिल के कागज़ पर उनकी कहानी लिखी थी ;


छोटी सी "ना", उन्होंने नई कहानी लिखली ;
हमने तमाम ज़िन्दगी की परेशानी लिख ली !

सजन कुमार मुरारका

तुम और मैं (प्रेमी )

तुम और मैं (प्रेमी )
तुम
तुम्हारी यादें
प्यार के वादें
लम्बी लम्बी बातें
और
मैं या तुम 
अब जब साथ होते
बढ़ती उम्र
सफ़ेद बाल
के बीच
मोहब्बत खपाते
तुम्हारी सांसें
जिसकी खुशबू
मदहोश करती
अब थोड़े मे
उखड़ जाती
हम घबरा जाते
नीली आँखें
प्यार की प्याली
चश्मे से भी
धुन्द्ली देखते
झरने सी हँसी
निर्झर बहती
गृहस्थी की दलदल में
रुखी-सुकी सी पाते
तुम हो तो
यादें है
पुरानी तस्वीर सी
कभी कभी देखते
अगर न होते
थका-हारा सा
मैं होता
बिस्तर पर
सोते और सोचते
तुम होती तो
क्या होता
कैसे कैसे दिन होते
बिस्तर पर
साथ साथ सोते
थोड़ी सी बातें
फिर झगड़ते
पर दूरी
ना होती
और मैं होता
तुम होते

सजन कुमार मुरारका

यों ही ..कुछ ...बात या बेबात, मिलन की !!

यों ही ..कुछ ...बात या बेबात, मिलन की !!

मिलन की खुमार,चड़े हुवे नशे की सुमार,
नशे की सूरत उतरे पर मिलन की खुमार ?


एतवार अभी बाकी, खुश्बू रह गई मेरे पास;
यह मिलन के बाद का नशा है या एहसास ?


चमन मे खिलते फुल और मुरझा जाते ;
झोंकें हवा के खुश्बू फैलाते और मिट जाते !


कहते बहार आती और फिर चली भी जाती !
मिलन की बहार और खुश्बू मनमे बस जाती ।


तलवार कि तेज़ धार सी नयन की चले  कटार;
अधरों की लाली, समाये लाल ग़ुलाब बेसुमार !


नख स शिख तक, करके प्रिये सोलह श्रृंगार ;
लाख कहो,ना-ना,मन मे है मिलन-इन्तज़ार!

मिलके,ज़ुदा हो गये खुदसे, हुस्न से था प्यार;
दिल ने दिल को कहा,अभी तो बाकी है दीदार !


बिज़ली सी कोंध जाती, अन्धेरी रात के सन्नाटे मे,
हुस्न का "ज़लवा", ज्वालामुखी सा फ़ुटता मन मे !


सजन कुमार मुरारका

यों ही ..कुछ ...बात या बेबात, ऐसे ही !!

यों ही ..कुछ ...बात या बेबात, ऐसे ही !!
wwwwwwwwwwwwwwwww
शाम हुई,दीये जले,तारे भी  धीरे धीरे

परवाने निकले, रोशनी के दीवाने सारे

हुस्न का चढ़ता रंग,बेताबी चहरे के परे

रात ढलती, दूरियां मिटे,दोनों मिट जाते

kkkkkkkkkkkkkkkkkkkkk
सूरज की पहचान ,रोशनी लिये घूमता

चाँद का भी कमाल, उधार पर मचलता

दिन मे निकले सूरज, दुश्मनी है रात से

चाँद पागल,लेकर उधार,निकले रात मे
llllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllll
लम्बी जिन्दगी की दुआ जब मुझे मिले

सोच मे भीषण  बवंडर आये होले -होले

जिन्दगी अब कांह जीते,यों ही  काट रहे

जिसे काटना है,उसे फ़िर लम्बा क्यों खींचे

jjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjjj
ईश्वर,अल्लाह,जीसस जाने हम उनके सन्तान

हमे कम नहीं समझो, कसम है जगत पिता की

उनसे तुम भी,उनसे हम भी, और सब बाकी भी

वेवकुफ़ी है फिर खून से खून को धोकर मिटाने की

iiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii
वह हमे भूल जाये,यह बात होई नहीं सकती

भुलाने के लिये, हमे याद करना होगा ज़रूरी

तस्वीर मिटाने से पहले, तस्वीर थामनी होगी

वेवफाई बताने से पहले,वफाई जानना है ज़रूरी

nnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn
सजन कुमार मुरारका

"सेदोका"..एक नया प्रयास-(भाग-तीन)

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"सेदोका"..एक नया प्रयास-(भाग-तीन)
***********************
सो-सो लफ्ज मे
लुटाया बेसुमार
एक लफ्ज काफी था
दिल की बात
अरमान दिल के
ज़ताने को था प्यार
........................

तेरा मिलन
बदन की खुशबु,
सीने मे  हलचल
सासों  की मस्ती
ढल गया आंचल
बुझाती नहीं प्यास

.............................
दु :ख  के बाद
सुख  का है  सफ़र;
स्वप्न भरी  आरजू
जीने की आश
नादान दिल माने
जीता इसी बहाने

.............................
बरसात मे
बादल अम्बर में
विरह  नयन में
बरसे दोनों
एक मिले धरा से
एक गिरे धरा पे

.............................
ब्याकुल मन
चिन्ता भरा संसार
दुःख करे बेकार
धीरज धर
मत्त का नहीं सार
प्रभु चरण धार 

.............................
विवेक द्वन्द
मन भटक रहा
दिमाग हार जाता
स्वार्थ-लालसा
बेशर्मी का तमाशा
जीवन परिभाषा

..........................
धर्म का सार
वक़्त कैसे बदले,
सुख, दुःख,  जलन-
ख़ुद में मग्न
नाउम्मीद ही मिले;
आ, प्रभु पैर तले

******************
सजन कुमार मुरारका

"सेदोका"..एक नया प्रयास !!!(भाग -दो )

                                                                            
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"सेदोका"..एक नया प्रयास !!!(भाग -दो  )
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बचपन से                                         कालि सी रात
अकेला न्यारा न्यारा                         अमबस्या की बात
नहीं किसी का प्यारा                         मिलन की आश;
सह के आंसू                                      पूनम रात  ,
बीताया जैसे तैसे                               चांदनी का मिलन 

**************                            **************
और रहा अकेला                                चाँद के साथ 
                       
अश्क आँखों से                                   आंसू बहते
दिल मे नस्तर सा                               दिल तो रोता नहीं
चुभता दर्द कोई                                   गम के सागर से
निकल जाता                                      आदत हुई
लाख संभाले दिल                                उजढ़ा आसियाना
दिल मैं समा जाता                               दर्द सा होता नहीं
 
************                        ***********
अब निड़ाल                                         निश्चल प्रेम
अपने से बेहाल,                                   हवा की तरह  है..
मकरी का सा जाल,                              दिखाई नहीं देता
टूटे जो रिश्तें                                        है  एहेसास,
बन गये निराले;                                   कल्पना का आधार
दिल मे फूटे छाले                                 सिर्फ होता विस्वास
 
************                       **************
मैंने स्वीकारा                                         चाहे हट के
जिंदगी सहती है                                     लगना है हट के
यातना के बंधन                                     जो सब हैं करते ,
रिश्तों से हार                                          नहीं करते
सिर्फ घाटे का सौदा                                 हर  खुशियों भूल
भाग्य फल की बात                                 नई राह मे  भटके,

****************                ****************
पथझढ़  मे                                             भरे नयन
पत्तो  की हरियाली                                  भीगे जो मेरा तन
चाहे  अब रिश्तों  मे                               अधरों मे  कंपन
निभाया नहीं                                         बिरही मन
चतुराई से बचे                                       दिल की धढ़कन
प्यार  नहीं उन मे                                  जागे मेरे मे अगन
 

*************                       *************
रिश्तों की नग्मे                                     प्रिया की याद
अविस्वास  की आंखें                              जीने की चाहत मे
कुढ़न वाली बांते                                     चुभ जाती काँटों सी
चाहत टूटी                                              हिम शिला सी
दूरी हमारे बीच                                       रहे परछाई सी
मिटा सगों का प्यार                                हर वक्त दिल मे
 

*************                           **************
सजन कुमार मुरारका

"सेदोका"..एक नया प्रयास !!!(भाग -एक )


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"सेदोका"..एक नया प्रयास !!!(भाग -एक )

हिंदी साहित्य की अनेकानेक विधाओं में ‘सेदोका’ नव्यतम विधा है। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान की सबसे नव्यतम विधा के रूप में स्थान लेता जा रहा है ।
सेदोका 38(अड़तीस )अक्षर में लिखी जाने वाली  कविता है। इसमें "छ " पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ , तीसरी में ७ ,चौथी मे ५ ,पांचवी मे ७ और छठी मे ७ अक्षर रहते हैं। संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है।"छ " पंक्तियाँ अलग-अलग होनी चाहिए। और किसी एक ही वाक्य को ५,७,७,५,७,७ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि छ पूर्ण पंक्तियाँ हों।
(आधार:-  हिन्दी साहित्य काव्य संकलन से लिया गया है ) उदहारण स्वरुप मैंने कुछ प्रयास किया है , इस विधा को को आइये सब मिलकर आगे और बढ़ायें |
सेदोका की प्रत्येक पंक्ति एक साक्षात अनुभव है। कविता के अंतिम पंक्ति तक पहुँचते ही एक पूर्ण बिंब सजीव हो उठता है।लिखते समय यह देखें कि उसे सुनकर ऐसा लगे कि दृश्य उपस्थित हो गया है, प्रतीक पूरी तरह से खुल रहे हैं, बिंब स्पष्ट है।

********************************************************
मन उदास
सिर्फ है  एहसास
भूली बिसरी यादें
आशांये टूटी
बीत गई जवानी
जिंदगी की कहानी

*************
कल गुजरा
हर एक कल मे
खेल आने जाने का
समझो इसे
कल  नहीं आयेगा
आज है ,कल होगा

**************
पड़  लिख वे
काबिल बनने को
घर कों छोढ़ चले,
रोटी के लिये
असहाय -जीवन
स्तब्द है अभिमान

************
तुम्हारे साथ
बिताये हुवे पल
जला रहे हैं मुझे
तुम्हारे बिना
पलक बिछाये हूँ
काटे न कटे पल

***********
पंख चाहिये
देना कोई पैगाम
प्रियतम के नाम
उड़ जाऊंगा
मन में है बिश्वास
पंख अगर होते

************

सजन कुमार मुरारका

शिल्प

 Ajanta Caves in Aurangabad - Maharashtra

शिल्प-

पाषाण शिला मे सजीव शिल्प अत्यन्त निराला;
अजन्ता के मूर्त-रूप मे प्रकट नारी-सौन्दर्य कला,
शिल्पी के अन्तर भाव छेनीसे निखर निखर चला,
चाहत थी या नहीं राजकीय, प्रेमातुर से रूप मिला!
नायिका की सुंदरता,रूप-अपरूप,अंग-अंग मे खिला,
कहे क्या, शब्द पाषाण, मुखरित हो गई पाषाण शिला;

                            जब देखता हूँ नजर भर सासें रुक सी जाती,
                            परी या नदी कोई जैसे चले इतराती-बलखाती;
                            सर से नख,यौवन भार से इठलाती-लज्जाती,
                            अल्लड़पन या चंचल-चित्त से लहरों सी लहराती;
                            यौवनमय,सुन्दर- सलोने देह की छटा बिखराती,
                            कामदेव की कल्पना सी नायिका, सजीव हो जाती!

शेव्त उदर-जल राशि सम, नाभी ऐसी पड़ी जैसे भँवर,
कटि-तट पर नागिन,-केश-लतायें जैसे घटा छाय अम्बर,
कचनार से अधर पर जैसे फूलों का रस गया हो ठहर,
लाली उसमे जैसे रसमय दाने फैलाए फ़ैली हो अनार ;
सीपों मे बंद मोती से नयन, काज़ल से बचे जो नज़र !
नाजुकता भरा स्पर्श,गोरी गोरी बाँहों से करे प्रेम पुकार;

                            दाँतों की सफेदी,धवल शेव्त रंग की दे अनुभूति !
                            घनकेश पिंडली छूता,नागिन कोई सा प्रतिभाति ;
                            उड़ते आँचल,मधु-कलश वक्ष पर,सुध खो जाती ,
                            पतली सी कमर लचके जैसे हवा चली बलखाती ;
                            पैरों के घुंघरू की पैंजनिया लय-मय धुन सूनाती !
                            रूप गर्विता की  सुन्दरता से अप्सरा भी शरमाती |

वस्त्र जो जाय फ़िसल-फ़िसल तंग कंचुकी से,
अंग-अंग की दिखे झलक गुलाब की पंखुडियों जैसे,
नज़र मटकाए,बल खाये,जब देख इतराये पलकों से;
खिली हो कली,सुघन्ध फैलाये, पुष्प बनने की चाह्त से,
इन्द्रधनुष कोई आकर लिपट गया हो गोरी के बदन से;
नख से शिखर तक,जब अंग देखता हूँ तेरा हर नजर से !

                                  नथुनों मे भर गहरे सासों का निशब्द तूफान;
                                  टूट जाता है सब्र,मधु पीने मधुकर है परेशान,
                                  कोमल कपोल,पयोधर वक्ष,कटि सुन्दर सुजान;
                                  उद्भाषित,उन्मिलित,उन्मुक्त मिलन आह्वान!
                                  रती-नायिका,शृंगारिका, कहाँ वस्त्र का ध्यान |
                                  अजन्ता के मूर्त-रूप मे नारी-सौन्दर्य महान !
 


सजन कुमार मुरारका

यौवन ज्वाला





यौवन ज्वाला

लहर अंग-अंग मे,
नव यौवन की,
अठखेली करती लता-सी;
निज तन,निज मन भ्रमाय,
खिले-खिले फूल से,
वसन्त की हरियाली-सी;
हर अदा मे बवार देती फैलाय,
विभोर रास-रंग मे,
भ्रमित चित्त- प्रणय ज्वाला की,
भिन्न भिन्न उमंग से,
विचरे अभिलाषित पंख फैलाय;
मुखर या फिर मौन सी,
आनन्द विभोर मन ही मन मे;
पुलकीत हो बार-बार;
कम्पित अधर मुस्कान मे,
निश्चल नयन मे सपने सजाय;
रूप के मोहिनी जादु से,
प्रणय-गान गुंजन से,
लावण्य, कोमलता से इतराय;
श्रृंगार की मूक दृष्टि मे,
देखे नयन सचल ,
अपल हो दृष्टिमे स्तब्ध सी;
दिगभ्रमित आपने आप ही हो जाये!
छबि प्रियतम की,
ह्रदय मे बाँधकर,
तन की-लता सन्देशीका सी;
प्रथम प्रणय के भाव मे,
कैसे सहज,लज्जित चुपचाप;
विमुख अपने से,
निमेषहीन नयनों से तकाय!
सर्बसुख प्रियतम मे,
प्यार ही सर्वस्व प्रतीत पाय;
बहका-बहका विवेक,
अधीर और भी अस्थिर।
कुल मान-संस्कार निष्फल,निश्प्राय;
देह-मे रति झुलसे,
पंकिल हो चाहे सलिल-
या लघु लगे प्यार मे,
भावों की हर सीमा लाँघ जाय!
सुखद या मनोहर सी ,
व्यर्थ अभिमान से,
विचार-बुद्धी से सोच न पाय ।
शत बार गर्वित प्यार मे,
नभ से बरसती धारा सी,
धरती मे समाने को मचल जाय !

सजन कुमार मुरारका