Thursday, November 15, 2012

गज़ल




प्यार के जख्म से वेवाफाई की हर अदा गज़ल होती है ;
जख्म वह नासूर से टिसते  तो दर्द की गज़ल होती है |

अनकहे जज्ब़ात के हर लफ्जों से प्यार की गज़ल होती है ;
जज्ब़ात मे बह कर एतवार से माशुकी की गज़ल होती है |

जब ख़ुद को भूल जाये कोई तब दिल की गज़ल होती है ;
हर लम्हा याद आये जब कोई तो चाहत की गज़ल होती है |

दिल के  बसे ख़ामोश समन्दर से जज्ब़ात की गज़ल होती है ;
जज्ब़ात जो अरमान बन दिल से उगते तब भी गज़ल होती है |

बेवजह कोई बैठे-बिठाये लब पे याद आये  तो गज़ल होती है ;
और याद सताती  हो पर दूर तलक ना हो तो गज़ल होती है |

छोड़ चला गया हो पर दिल से गये  नहीं  तो गज़ल होती है ;
गौर से सुनने से दिल मे हरदम गुनगुनाते तो गज़ल होती है |



आँखों से जो टपकते अश्क तो बूंद-बूंद से  गज़ल होती है ;
होंटो पर चमचमाती हंसी सितारों से रोशन  गज़ल होती है |

उझडी किस्मत से उम्मीद की राह दिखें तो गज़ल होती है ;
नाउम्मीद की तड़प, किस्मत की बददुआ की  गज़ल होती है |

हर पैमाने पे ज़िन्दगी बोझ लगे तो मायुसी की गज़ल होती है ;
ज़िन्दगी अलग से  ख़ुशनुमा लगे तो ज़िन्दगी की गज़ल होती है |

जाने आगे क्या होगा सोचकर दिल की धड़कन गज़ल होती है ;
हर पल को जो जीये-मरे इस तरह से,और जीयें  तो गज़ल होती है |

सजन कुमार मुरारका

"धन्यवाद का सन्देश "



 
मैं अनजान कैसे तेरी राह मे आया था ,
और न जाने कब तेरे दिल में समाया था,
मेरी राह तो बिराने  की तरफ़ जाती थी!
दोस्त! जाने क्यों तुमने अंगुली थामी थी !
जब भी  ख्याल आये,मैं सोचता रहता था,
कभी किसी समय का याराना या रिश्ता था !!
क्यों शमा बनके मेरी   दुनिया रोशन करता है,
ख़्वाब की मानिंद हर वक़्त  दिमाग में रहता है.
वो बहता  रहता  मेरे जिस्म में ज़ोश  बनकर ;
वो प्रज्वल्लित करता मेरे मन को आग़ बनकर ।
मेरे पास नहीं, हरदम मगर मेरे साथ रहता है |
ये बात सच है फूल सा बगिया को महकता है !
मेरे ग़म का सागर उसके  हौसले से निबाह था ,
निबाहने तो रास्ते में साथ साथ मेरे चला था  ।
मेरी क़मीज़ स्याहियों की कालिख़ से कालि थी |
शाबासी के लफ्ज़ों से उसने धुप सी चमकाई थी ;
मुझे रोशन करने मैं वह किरन-किरन में बिखर था,
मेरे लेखन मे "
उन सब "का "सरयू "सा योग था !!


सजन कुमार मुरारका

उम्र का क्या तक़ाज़ा बहकने से



गजरा सजाया मैं ने मगर;
खुशबू फ़ैली देर तक,
                      हर दिल मे जंवा सा असर ,
                      चाहत जवां होती रही दुर तक ।

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श्रुंगार की बात न बताइये,
उम्र नहीं होती दिल लगाने की,
                     बस एक इशारा भर चाहिये,
                     नशे का आलम नहीं रहता बाकी। 

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पड़ने लगी जो चांदी बालों मे,
तजुर्बे का पैमाना है उम्र का ;
                       अजमाने की मुराद है मन मे ,
                       बची हुवी ख्वाइशे है जताने का।

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थकेगा शरीर जब काया से,
तब सोचेंगे क्या खोया उम्र मे;
                        याद आएंगे हर पल बीते से,
                        जो गवाये बिन श्रृंगार रातों मे।

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दिन मे हम यों ही नहीं सोते,
के उम्र बीती हमारी,रातें जगते ;
                           हमे तो लगती थी तब छोटी राते ,
                           तभी अब इस उम्र मे दिन मे सोते !
 
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लोग सही कहते,इस उम्र मे भी;
बहकते हम गजरे की महेक से,
                             पूछेंगे उनसे जरा,पता तो चले भी,
                             उम्र का क्या तक़ाज़ा बहकने से ।

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प्यार के इशारे कभी नहीं बदलते,
"
प्यार "का गजरा हमे मदहोश करता;
                   
   हम तो बस प्यार जताने लिख लेते,
                       और वो प्यार का इशारा समझ ही जाता।
 
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बस इतने मे कैसे खुश हो लूं,
बस चले तो बाते जरा लंबी कर लूं ,
                       आज "
प्यार "की कविता को समझ लूं ,
                       गजरे की महेक से इस दिल को जवां करा लूं।

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 सजन कुमार मुरारका 

समस्या मे है समाधान

 
गतिशीलता है जीवन का आभास !

समस्या के अस्तित्व के साथ बास;

चलनेवाले से ताप का होत विकास,

ताप रहित जीवन नहीं होता विश्वास!

जीवन-ताप को माने समस्या समान;

शक्ति करती नव निर्माण का समाधान ।

कभी बन जाती विकट,ध्वंस का सामान,

कभी प्रसूत करे नित नये सूत्र बिज्ञान !


प्रेरणस्रोत मूलरूप से होत अन्त-सलिला ,

दोष दूसरों को देते रहते,अन्दर का है रैला;

शरीर-कर्म का सद्पयोग न कोई झमेला,

ताप-शक्ति सहयोग स चले सारा खेला !


सटीक निर्णय की त्वरित शक्ति चाहिये,

समस्या से ताप समाधान की शक्ति बनाइये,

होगा समस्या का निदान निश्चित पाइये;

अपेक्षित ताप-शक्ति समन्वय होने चाहिये ।

जागृति मुख्य भाग है सम्पूर्ण जीवन का !

मन-वचन-कर्म सहज़ आधार परखने का,

स्वप्नावस्था में देखा सत्य होता भ्रम का;

जाग्रति स्वप्नको आभाष कहे मिथ्या का ।

समस्या जीवित अवस्था मे दीर्घ स्वप्न होता,

मन की सुप्त अवस्था से यथार्थ ही प्रतीत होता;

अवचेतन मदारी बन ,चेतन को नाच नाचता,

जिन्दगी को खिलाता खेल,स्वप्नवस्था मे रहता ।

यह प्रमाणिक है विफलता से जों भी घबराये,

प्रयास न कर पूरी तरह हताश,निश्चेष्ट हो जाये!

वास्तव मे माली खुद ही देत है खेत जलाये,

बीज़ बोये, सीचें,समय लगे, फ़सल उपजाये।


सुषुप्त-चेतना मे रहे अहम, अविद्या- विद्यमान-।

समाधिमे वासना सुप्त रहे,लुप्त होने का नहीं प्रमान;

चेतना से चिंतन करे, चैतन्य पूर्ण हो, मिटे अज्ञान!

अनुभव समस्या नष्ट करे,चिंतन देता समाधान !!


**सजन कुमार मुरारका **


उल्लू चड़ लक्ष्मी जी आये !
तुष्ट होती उल्लू जो बनाये ,
उल्लू बनाय धनवान हो जाये,
लक्ष्मी जी का वाहन बताये !!
मुर्ख को उल्लू बताया जाय,
उसी के सहारे लक्ष्मी पाय ,
जो उल्लू किसी को न बनाय,
लक्ष्मी जी किस तरह आय !!!

सजन कुमार मुरारका

पिताजी ने कहा


 
पिताजी ने कहा  
हमेशा सच बोलना,
!!?!!
झूट को सच बनाकर;
अब झूट सच ही लगता !
कोरा सच हज़म नहीं होता,
और मैं सच ही बोलता हूँ |


पिताजी ने कहा
हमेशा ईमानदार रहना,

!!?!!
हर ज़गह है बकरार;
बेईमानी की ईमानदारी !
इमान से पेट नहीं भरता ,
स्वार्थ  के प्रति मैं ईमानदार हूँ |


पिताजी ने कहा
हमेशा न्याय का साथ देना,

!!?!!
अन्याय से चले सरकार;
अन्यायीयों का दामन थामे !
न्याय भरे बज़ार नगां होता ,
अन्याय सहकर न्याय करता  हूँ |

पिताजी ने कहा
इन बातों से सुखी रहोगे देखना,

!!?!!
पिताजी की हर बात हरबार;
क्या जरुरी है सही होना ?
पर सुखी होने के लिये,
मैं उसे किसी भी तरह निभाता हूँ|


(पिता बोले थे-नामक हरीश करमचंदानीजी की कविता से प्रभावित)
सजन कुमार मुरारका

वा रे सरकार तेरा चक्कर-भाग -2



गज़ब लोगों की, अज़ब सरकार;
आमदनी कम,महंगाई की मार;
सस्ते होगें तब उनके सिलेंडर !
सालाना आमदनी हो लाख के अन्दर।


खाली होगी जेबें,मिलगें सस्ते सिलेंडर,
हालात ऐसे,जैसे सांप के मुहं छछुंदर;
सोच समझकर तरकीब बड़ी सुन्दर,
ग़रीब कंहा,वह जो लेगा "नो" सिलिंडर!

चतुराई से उठाये कदम,गरीबी खत्म ;
फिर भी क्यों मचाते शोर हरदम!
औकात नहीं खरीदने की हैं बेशर्म,
तब भी लगे  उन्हें "छ" सिलिंडर कम ।

भूखे नगें लोग "छ"-"नो" के चक्कर मे ,
बदनाम करते सरकार को बेकार मे !
गरीब मरे तो कमी आये गरीबी मे ;
महंगा खरीदें,शक कंहा धनी कहलाने मे !

सजन कुमार मुरारका

खोया हुवा दिल



आज अचानक बहुत दिन बाद,
मुलाकात हो गई;
मेरे खोये हुवे दिल से,
काफ़ी दिन से गुमशुदा था ।

कितनी मिन्नत,कितनी फ़रियाद,
खोजने  की हद हो गई;
पूछा हाल-चाल दिल से,
क्यों इतने अर्सेसे वह मुझ से ज़ुदा था ।

आँखों मे भर पानी,सुनाया संवाद ,
प्यार की इन्तिहां हो गई;
प्यार किसी से हो गया था उसे ,
नासमझ दिल कब उसी मे खो गया था  ।

जर्जर, मासुम से चहरे पर अवसाद,
जीने की तमन्ना खत्म हो गई;
टूटे हुवे दिल को सम्भालु कैसे,
"दिल्लगी" को उसने "दिल की लगी" समझा था ।

समुन्दर की रेत पर लिखा होता बरवाद,
लहरें आई और धो गई;
रेत का दोष इसमे कैसे,
नदानी थी दिल की,ग़लत जगह लिख था।

दिल को वापस लाने की थी कबायद,
अब जरूरत बड़ी हो गई ;
जीने को जी लेते लोग जैसे-तैसे,
पर रेगिस्थान मे वेवकुफ़ पानी खोज रहा था ।

सजन कुमार मुरारका

बोलो जब सोचकर बोलो !!



सुनो भाई साधो,कहते गुणी जन, हमको समझाय;
बोलो वचन मधुर ऐसे; जो मन को शीतल सुहाय,
कभी ना बोलो कड़वे बोल, अंतर्मन को बिंध जाय,
ज़ख़्म लगा तलवार से फिर भी उपचार किया जाय,
बातों के ज़ख़्म का "वैद्य धन्वन्तरि' न कर सके उपाय,
कभी भी  किसी का दिल दियो ना  अकारण दुखाय ,
मन टूटे  एक बार,लाख यत्न करो फिर जुड़ न पाय,
जुड़े भी जो दाग रहे,जीवन भर दिल मे बसा रह जाय ;
सदा मूर्खों ने फ़िज़ूल की बातों से दिया कोहराम मचाय ,
कह गये लोग पुराने,टक्का दे चाहे, उससे पीछा लो छुड़ाय,
ज्ञान की बातें उनके समझ न आय,व्यर्थ समय क्यों गवायें,
जैसे की सच है ,भैंस के आगे वीण बजाय, भैंस बेठी पगुराय ; 
मूर्ख सखा से नहीं होता भला ,बुद्धीमान दुश्मन ही रखा जाय !
मुर्ख सदा दु:ख ही बांटे, बबुल जंहा उगे,संग कांटे उपजाय,
सरसता दे रिश्तों मे, प्रेम प्यार के बोल से जो जीवन बिताय,
कस्ट आये जब भी,  मिल बाटकर ,अपने आप कट जाय !
अपनों का तिरस्कार करे, जो अपने अभिमान मे बोले जाय ,
अहंकारी का विनाश ख़ुद प्रभु ने किया, फिर उसे कोन बचाय ?
अपनों का अपमान से, मन की ज्वाला विवेक को भष्म कर जाय,
पता नहीं कब खोल दें ,अपमानित घर का भेद,विनाश दें  कराय !
बोलो जब भी सोचकर बोलो,मीठा बोलो,दूजा न कोई सरल उपाय,
ज्ञानीजन कहतें; गूंगे के दुश्मन कम होत,क्यों की वह बोल न पाय,
"सजन" ताहे कहे ,ऐसे वचन बोले,जो किसी का दिल ना दुखाय !
*सजन कुमार मुरारका *

हम नहीं पीते यों ही .....!!!?!!!



मुझे शक की निगाहों से ना देखो,मैंने पीना छोड़ दिया,

यों ही आँखें लाल हो गई ज़ालिम, तुम ने जो ज़ख्म दिया ,

मेरी गली आना,देखना ,तेरे नशे ने मुझे  बे-होश कर दिया,

जबसे ज़ुद्दा हुई  तुम,हमने तो मयखाने जाना  छोड़ दिया;

कितने पियें ज़ाम,ह़र नशा,तेरी यादों से कफुर हो लिया |

मेरा रुख मोड़ने की कुरवत मे,तुने मेरा साथ छोड़ दिया,

रहने लगी ख़फा-ख़फा जब से,मयखाना  ही छोड़ दिया,

लबों को सिल के भी, साकी से नज़रें मिलाना छोड़ दिया.

मोहब्बतकी आयतों को सनम,ख़ुदा-ऐ पाक का दर्ज़ा दिया |

फिर भी नजरें न हुई इनायत,हमने ग़म से दामन जोड़ लिया,

तेरी आँखों से नफ़रत का उलहाना,हर बाज़ी को डुबो दिया

शराब की थी नहीं इतनी औकात,तुम ने ही मदहोश कर दिया,

जब से हारी तेरे प्यार की बाज़ी,दिल ने जीना मुहाल कर दिया,

प्यार की तपिश का गुमान ,बेवफाई ने हाल बे-हाल कर दिया |

इतने पर भी जब दिखी बेरुखी,हमने प्यार मे इठलाना छोड़ दिया,

क़सम ख़ुदा की हम पीने के लिये अब  मयखाने जाना छोड़ दिया,

हम तो चले जाते यह सोचकर, कंही,तुमने वहां हमे तलाश किया,

हम पीते नहीं जानम,वक़्त तुम्हारे इन्तज़ार का यों हल्का किया |

नाशा छोडा,तुम छोड़ गई ,सोचते तुम लोटोगी,जो नशा लोटा दिया,

मैं तेरे हुश्न के गरूर से नशा किया,एतराज़ न जाने तूने क्यों किया,

तुझ पर एतवार करके, ग़म का, ज़िन्दगी भर दिल पर ज़ख्म लिया,

ग़म ग़लत करने अगर अब हम पी लेते हैं तो, क्या ग़लत किया ?!!!

*सजन कुमार मुरारका *

त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!



त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!

हुश्न के ज़लवे पर इतना न तुम  इतराव 
चमक दो दिन की,वक़्त रहते संभल जाव

...............................................
आईना हुश्ने-जिस्म की खुबशुरती बयां करता है
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मेरे जज़्बात की कद्र कंहा,हर रोज़ यों ही दम तोड़ते
परवाह भला उन्हें क्यों, वह तो मोहब्बत का कारोबार करते
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शायर ही ना होते ग़र इश्क मे बेवफाई का हुनर ना होता
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चोट अब भी लगती पर दर्द होता नहीं
चेतना तो मर  गई पर जिस्म मारा नहीं

...............................................................
हुक्मरानों की सियासत ने हमें बाँट रखा है
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रास्ते का पत्थर,मन्दिर पहुंचा,प्रभु का दर्जा मिला
ठोकर मारने वाले ,आते जाते सज़दा करते,अन्ध-बिस्वास का भला

..........................................................................
धर्म के नित नये ठेकेदार ;लूट रहें दुनिया सारी
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किसी के दर्द को बांटना हो तो,दिल मे उतर कर देखो
भर के बांहों मे,उसकी आँखों मे खुद की औकात देखो
..........................................................................
दर्द की ग़ज़ल उम्दा होती,दिल की लगन जब लगती
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

कुछ सोच मे बदलाव चाहिये इन्कलाब के लिये
बर्फ बने दिलों मे ज्वालामुखी सा रिसाव चाहिये

..............................................................
मौनम सन्मति लक्षणम,अत: जो सहे वह मरे
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
अब रिश्तों का मुल्यायन होता  स्वार्थ के बाज़ार मे
बिचित्र गणित,सास-श्वशुर बदल जाते मात-पिता मे

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तरक्की के दौर मे प्यार भी व्यापार नज़र आता है
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सजन कुमार मुरारका

गांधीवाद !!!



।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।
गांधी जी के तीन वचन अनमोल;
बुरा न सुन,बुरा न देख,बुरा न बोल,
शायद इन्सानियत हो गई अपने मे लिप्त,
बचने बचाने को बन गया गांधी भक्त ,
और उपदेश को ध्यान से रखता सशक्त |
@@@@@@@@@@@@@@हर तरफ़ आवाज़ है कितनी घनघोर ,
सत्ता के गलियारे मे घूम रहे चोर ;
महंगाई की मार,हाहाकार पुरज़ोर ,
फ़रियाद सुननेवालों मे भी घुसखोर ,
मैं कंहा सुनता यह सारे के सारे शोर !!

@@@@@@@@@@@@@@@जितना भी हो दुराचार, भ्रस्टाचार,
सत्ता का हो दुरउपयोग, दूरव्यवहार ,
नारीयों से चाहे व्येबिचार,बलात्कार ,
बहुवलीयों की सरकार या अत्याचार,
मैं कंहा देखता हूँ,रहता निर्बिकार !!

@@@@@@@@@@@@@@@
संविधान ने दिया जो अधिकार बेमोल;
स्वाधीन भारत मे मन खोलकर बोल,
प्रतिवाद की आवाज़ क्यों हो गई सुप्त ;
रोटी,कपड़ा और मकान का दर्द संतप्त ;
आतुरता मे बोलना बन्ध,शब्द हो गये लुप्त |

@@@@@@@@@@@@@@@
गांधी जी के उपदेश के सब  मोहरे थे बंदर !
क्या हुवा आज़ भी नेता अगर बनाते हमे बंदर |
गांधीजी ने भलाई बताने बंदर को बनाया मोहरा ,
आजके नेता चाहते अपनी भलाई, बनाते मोहरा ;
गांधी के नाम पर दुकान चलाते,झूट का सहारा |

@@@@@@@@@@@@@@@@
जीवन की ह़र बाज़ी मे आम आदमी से  धोखा,
ज़ुल्म का हश्र बुरा, इतिहास का लेखा जोखा ;
बंदर नाच नचानेवालों सुनो विद्रोह दस्तक देगा,
देखो चेतना के नवउदय की झिलमिलाती रेखा !
बोलो तुम्हारे ज़ुल्म का हिसाब और कोन  देगा ?!

_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।_।
सजन कुमार मुरारका

"त्रिशूल"......(द्वितीय चरण)..!!!



"त्रिशूल"......(द्वितीय चरण)..!!!

क़ुदरत का बड़ा अज़ुबा,हर इन्सान को जन्मती औरत
इन्सान का बड़ा अज़ुबा,इन्सानों के हाथ मरती औरत
............................................................
कुदरत भी अचरज़ मे- इन्सान बनाया,बन गया शैतान
***********************************

खंज़र से लगा ज़ख्म फिर भी भर जाता
ज़ुबां से लगा ज़ख़्म कभी भर नहीं पाता
.............................................................
बोलो जब भी, बोलो मीठा बोल
***********************************

मुल्क की हिफाज़त थी जिन के नाम
उन्हों ने ही किया इसका काम तमाम
..............................................................
चोर  के हाथों मे दिया चाबी थमाय
***********************************

ख़ुशी के लम्हों मे आंसू निकल आते
ग़म की बात ही क्या, आसूं तो बहते
..............................................................
आसुंओं पर न जाओ,इनकी अलग सी दास्तां
**********************************

बड़ी मुद्द्त से चाह थी कोई दिलरुबा मिले
मिले भी तो सनम,बड़े ही वह  बेवफा  मिले
..............................................................
प्यार को असर अब दिल मे नासूर सा बसता
************************************
पेट की भूख सब से बड़ी बीमारी और लाचारी
धर्म,इमान कुच्छ भी नहीं बचे,पड़े सब से भारी
...............................................................
भूखे पेट भजन ना होये नन्दलाला
************************************
आजका मज़नू,भटकता हुआ भंवरा, कुच्छ आवारा,
कली-कली की चाहत,पर काँटों से उलझता बेचारा
.................................................................
परवाने जल जाते यों ही शमा के खातीर
**************************************

महबूब को पाकर, ख़ुशी मे ज़िन्दा थे बेमिसाल
उनको खोकर भी ज़िन्दा हैं लाश सारीका हाल
................................................................
उनको पाने को जीते थे,अब भी पाने को जीते हैं
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सजन कुमार मुरारका

माँ



सपनो मे , खयालो मे,
किस्सों मे, यादो मे,
देखा तुमने खुद को मुझ मे,
अपने हर उन लम्हों मे,
उन एक एक मुश्किल पलो मे,
उतारा मुझे इस जहाँ मे !

खुदा को लाख लाख शुक्र भेजें,
आँखे खोल कर जो देखा तुझें,
उसने भेजा तुम्हारी गोद में मुझे,
भेंट दिया, तुम्हारा ही हिस्सा तुम्हे,
एक नन्ही सी जान को प्राण सीचें,
तुम्हारे दिल का हिस्सा मिला मुझे !

एक नयी कहानी को जन्म दिया,
तुम्हारे ही नैन नक्श है दिया,
प्यार करना तुमने सिखाया,
जीवन का अर्थ समझाया,
दुनिया में आने से पहले बताया,
सारा संसार तुमने दिखाया !

परियों की कहानी सुनाये,
राजा के किस्से बताये,
खेल खेल में पाठ पढ़ाये,
जीवन के सारे रंग दिखाये
अपने हाथो से खाना खिलाये,
 हरबार कितना प्यार जताये !

सारे घर में पकड़म-पकड़ाइ,
जब निवाला मुह मे न डाल पाइ,
चोट मुझे लगने पर तेरी रुलाइ,
खून निकलने पर यों पथ्थराइ,
तुम्हारी आँखों ने वह बात बताइ,
जो शब्दों में कभी उतर ना पाइ,

क्या होती है माँ--!!
आज तक यह समझ ना आया,
रिश्ता बड़ा अजीब,गहरी दास्ताँ;
पता नहीं भगवान ने कैसे बनाया,
इतना दुःख दिया मैंने तुझे मेरी माँ;
सब सहा, और ख़ामोशी से निभाया !

मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनी,
मेरा मार्गदर्शन हो;
हर डगर में सहारा तुम बनी,
जीवन का  हिस्सा हो;
मेरी उदासी तेरा दर्द बनी,
ममता से मजबूर  हो;

घड़ी दो घड़ी की बात नहीं यह,
जीवन भर का साथ है यह,
माँ, तुम्ही से सब कुछ है यह,
नहीं तो जीवन ही  व्यर्थ है यह,
कहकर कैसे समझाये यह,
हर इबादत से परे यह !!
सजन कुमार मुरारका

"त्रिशूल"......(प्रथम चरण )!!



श्री गुलजार जी की लिखी 'त्रिधारा' ये रचनाए पढ़ी। इस प्रकार की रचना मे तीन चरण होते है। पहले दो चरण एक साथ औए तीसरे चरण से एक नया अर्थ प्राप्त होता है। उनके प्रयास के साथ मुझें भी कुछ लिखने का मन हुवा ।शीर्षक है "त्रिशूल"......(प्रथम चरण )!!

दिल मे बस जाता कोई  जब
नशा इश्क का चढ़ता जब
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पाँव तब ज़मीन पर नहीं पड़ते
************************
दिन गुज़ारते उम्मीद से ,रातें गुज़रेगी ख्यालों मे
रातें नहीं गुजरती ख्यालों से,इंतज़ार के लम्हों मे

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उढ़ जाने को दिल चाहता  पंख लगा के
*****************************
चंपा -चमेली सी ख़ुश्बू से रातों को महकाये
मय -भरी आँख से  ,मिलन का संदेश जताये

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
सम्भल ले सपेरा, नागीन कंही डसं न जाये
****************************उमड़ पड़ेअम्बर धरती की प्यास बुझाने
माटी भी महक उठी मिलन स्पर्श बताने

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आया सावन झुमके ;आया सावन झुमके
*********************************
भीख के मिले पकवानों से अच्छी मेहनत की रोटी
वोटों की भीख मांग,फीट हो गई नेताजी की गोटी

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,अब पछतायें क्या हो चिड़ियाँ ज़ब चुग गई खेत
************************************
पत्थरों को तराश के बनती हसीन मूरत
दिल को तराश कर सजाई थी तेरी सूरत

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बेवफ़ाई मे खप गईं यादें,जैसे खड़ा ताज़महल
************************************
निर्वाचन हमारे देश मे नाग-पंचमी का त्योहार है
दूध(वोट)हमको इन नागों(नेताओं)को पिलाना होगा
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जान-माल की हिफाज़त ख़ुद को करनी होती है
*********************************
सजन कुमार मुरारका

Wednesday, November 14, 2012

प्रेम चिरन्तन एहसास




प्रेम चिरन्तन एहसास 
"प्रेम" का
लब्ज़ ,सदियों से सुनते आये;
हर एक ने समझ लिया,
पर कोई नया अर्थ;
या नया प्रति-शब्द ;
कंहा किसी ने कोई बताया !

"प्रेम " जो,
वक़्त दर वक़्त चला,
हवा बदली,अन्दाज़ बदला;
एक सी साँसों की गति,
जताने की वही विधी,होंठों पर चली,
कंहा किसी ने कोई बदलाव दिखाया!!

"प्रेम" में,
यह ही साबित हुआ,
घटिया/बढ़िया बहाने भी,
कितने मनमोहक लगे,
प्रेमातुर ही जाने;
कंहा किसी ने कोई ऐतराज़ किया!!!

"प्रेम" के,
शब्द या,
ह़र अन्दाज़;
नई लिपि, नई भाषा,
क्या नया महसूस हो पाया  ?
कंहा किसी ने कोई बदलाव किया!!!!

"प्रेम" की,
कविता-पुरानी हो;
या नई या हो जैसी भी,
लगे प्रमिका सिमट आई पास।
रहता है केवल प्रेम"का एहसास,
कंहा कोई बदल पाया कोई परिभाष!!!!!
:सजन कुमार मुरारका

आरजू थी दास्ताँ लिखेंगे.......!!

 
 आरजू थी, मोहब्बत का पैगाम लिखेंगे ;
तन्हाई मे कैसे गुजरी रात वो दास्ताँ लिखेंगे !

ख्वाहिश से भर कर अल्फाज, इल्जाम लिखेंगे,
कसमे-वादे,प्यार-वफ़ा,शिकवे-शिकायत लिखेंगे !!

तमाम रात ख़यालों से सजी हुयी छोटी बढ़ी बातें,
दर्द से गर्क़, दहन से सुर्ख, हर अल्फाज सजा के ;

निद्राहीन आँखें ,आँखों की पुतलियों मे नींद जागे !
भटकी हुई रुहु की माफीक मुक्ती की पन्हा मागें |


लहू सा तपता सूरज निकला अम्बर मे ले उज्जाला ;
मसल दिया सारे ख्वाब,मन मे तृष्णा का अंगार जला !!


बंद कर लेते अपने होंट, मगर दिल से दर्द है निकला ;
खुदा का शुक्र है ! अभी तल्लक मेरा जनाजा न निकला |


:-सजन कुमार मुरारका

धढ़के- यादे बन उन के दिल मे !!!

 
 
पथ्थर की चट्टानों को चीर कर निकलता है दरिया,
सनम पथ्थर दिल से "आह" की भी है खामोशिया,

समंदर से मिलने को बेताब दरिया दौढ़ लगाती ;
मेरी जान की दुश्मन, पास से उठकर चली जाती,

समंदर मे भी चाँद के आकर्षण से ज्वार- भाटा आता,
ऐसी क्या रुश्बाईयां, वह पर्दा नहीं ह्ठाती  खिढ़की का |

पर्दा-नशीं थे नहीं वह, हुश्न की चर्चा सरे बाजार होती है ;
सरेआम महफील मे उनका जलवा कत्ले-आम मचाता है !

कत्तल भी हो जायें,  रजो-गम नहीं,   दीदार तो होता है ,
अफ़सोस किसी भी दौर का नहीं,यादें दीदार की महफूज है ;

मेरे दिलवर की शोख़ी,खिलती कलियों की नक्श- पहचान है,
रहम-ऐ-अदब का तकाजा, उनकी सादगी कलियों को बख्शा है ;

सादगी की यह मूरत, फूलों सी मासूमियत का नाकव पहेने है ;
लरज़ता दिल,रंगीनियाँ छुपी है सीने के अन्दर, मेरा दिलवर है !

मासूमियत की सादगी से, वह जहेन में फरेब का नश्तर चलाती ,
मुहब्बत की सर्द चट्टानों को पिघला कर आग का समंदर बनाती ;

हक़ीक़त में बियोग कि आग, बर्फ बनके, चोट पर लगा रही मरहम !
जिस्म के अन्दर पिघल रही बर्फ, अश्क बन, बहती रहती है हरदम |

नफरत न होना बुज़दिली की बात नहीं, न है कोई शिकवा वेबफाई से,
मालूम मुझे खोखली दीवाल पर टीका यह बेरुखी का किल्ला वहम से ,

कितने अर्स काबीज रखेगी वह जिद्द खुद के बेकाबू दिल की धढ़कन पे ,
हमारी भी जिद्द है, मरते दम तक, यों ही धढ़के- यादे बन उन के दिल मे |

सजन कुमार मुरारका

जिन्दगी का फ़लसफ़ा




"प्यार" ही जिन्दगी का शायद सही फ़लसफ़ा है ;
जो हर एक " जिंदादिल"  जिन्दगी  में  बसता है ;

वैसे चाहे, कोई अकेला भी जीने को, जी लेता है !
वीराने मे खिले- गुलबहार,वह कोई खिलना है ?

किसी के दिल में पनाह पाये,यह हमारी आरजू है ;
किसी के होंटों की मुस्कुराहट बने यह अरमान है ;

हम ना रहे, पर हमे याद मे रहने की चाहत है !
फरियाद करेंगे वह किस से, जब दिल टूटता है ,

कहते जो हमारे लिये उनके पास वक़्त नहीं है ;
खोजेंगे हमे,वक़त आने पर,यह हमारा वादा है !

मोजुदगी नहीं, होने का एहसास ही  खास है ;
दिल की नजर से देखिये, हम आपके पास है |
सजन कुमार मुरारका

अजन्मी कन्या का सवाल





मैं जन्म की चाहत में, तू ले आई"माँ"तेरी कोख मे,
बुलाया आपने प्यार से, किसी मिलन के क्षण मे;
परमपिता ने वरदान समझ भेजा- ममता के आँचल मे;
नफरत मुझसे क्यों ? आई नहीं बात समझ मे ;
सृष्टि अब भावी-सृष्टि पर,लिप्त कैसे अत्यचार मे ?
प्रति-पालक पिता क्या कर मग्न हुवे संहार मे ,
तेरे तन का लहू पुकारता तुझे जीने की आस मे ;
हत्यारे सोचो ' ध्यानसे'  तुम आये कैसे जग मे ?
मैं हूँ जग का आधार, मेरा निवास हर जननी मे |
फिर वह घातक रहते कैसे ,धरती माँ की गोद मे !
कैसा अनुराग है निष्ठुर" मात-पिता" का संतान मे,
कन्या या पुत्र का सृजन तो है उनके अधिकार मे ;
अपने किये का दंड,अजन्मी कन्या को अकारण मे,
तुम्हारा खून रहम मागें,असहाय लाचार अवस्था मे,
कब तलक पाप होग परम्परा,बंस-बेल की आढ़ मे,
तुम जरा इन्सान बनो, मत खो इन्सानियत, हैवानी मे !

सजन कुमार मुरारका

कथा मेरे जीवन की !

 अजाचित नियति से भाग्य मे जो दुख खिला,
संचित पीड़ा का अनचाहा उपहार जब मिला;
तढ़प गया हृदय, शांत रहता कैसे अकेला ?
सोचा,जीने की उमंग,प्रेम,शांति होती क्या बला !
कैसे कह दूँ,यह भी व्यर्थ ही सा था सिलसिला ;
प्रयाप्त तृष्णा मे शुष्क कंठ से अपना लहु पीकर,
अतृप्ती की ज्वाला मे जलता रहा जीवन स्तर,
चिंतनशील भविष्यत के अंधियारे से घबड़ाकर-
अपनो से थोड़ी सी रोशनी माँगी उम्मीद कर;
मेरी रिक्त अंजली मे रख दिये ज्वलन्त अंगारे भर ।
कहा, यह परम सत्य है,तुम सक्ष्यम हो जीने मे  ,
तुममें और औरों के गुणों में भेद नहीं कोई दृष्टी से,
धरा-व्योम मे चलकर,अदृश्य लोक से मनुज आते,
अर्थ खोजने जीवन का निज भाग्य रश्मि रज्जु से,
अकेले आते,अकेले चले जाते,चिराचरित नियम मे;
अकारण रोना-धोना छोड़ो,नई कोई नहीं रीत जग की,
हर हाल से ,जीवन चल जाता,जैसे तैसे योंही-कंही ।
यातनाओं को सहने की आद्त सीखो ,जीते हैं वही,
जीना है तो सहिष्णुता और धर्य से बात बनेगी  सही;
तभी,सहकर भी जी रहे,छूटे न जीने का लय, कभी,
मृत कोशिकायों मे अनुताप लिये,कथा मेरे जीवन की !
जब भी मन अशांत हुआ,बिछाता सेज कांटों की,
मगर आज मरी हुई  लालसा क्यों  प्रखर हो उठी !
क्यों कह रही,रह-रहकर, दबी-दबी,लुकी–लुकी सी ,
डूबते-जीवन की करुण कहानी,सुनने क्यों आयेगा कोई ?

:-सजन कुमार मुरारका