Sunday, September 9, 2012

कन्या-जनम



पुत्र जनम शुभ, कन्या जनम कष्टकारी, 
करे भेद-भाव, सब बिधि, अबिवेक-अबिचारी
न जानत, जननी रूप कन्या की छबी न्यारी
ध्यान दीजे, संतान सकल, सम प्रेम अधिकारी

शीतल वचन, कोमल मन, स्नेह सुख परिभाषी
मंगल मूरत, नित सेवत, सत चित, प्रकृती से दासी
निसदिन बोलत, प्रेम सहित डोलत,धरत सुखराशी
कबंहूँ नहीं मांगत, न कबंहूँ कठोर संकल्प फरमासी

करुनामय,रसमय, लछमी रूपा आनंद सुधा बरसाती
कोयल सी कुंजन करत, तितली सी मंडराती
सृष्टि की अधिकारी, सेवक मान, जग में जी पाती
कल्पतरु सी दाता,अपने दुःख अपने में समाती

कुंठित,भयभीत, लज्जित सा जीवन परे
मात-पिता,अग्रज-अनुज सब अनुशासित करे
जान कष्ट, शांत भाव-सदा ही धीरज धरे
प्रतिपालक जननी तू जब संतान रूप धरे

विचित्र रचना, भ्रमित माया जगने रच राखी
पराया धन ठहराये, जो धन दुःख में सहभागी
कन्या-दान अति महान कहे सब अनुरागी
फिर भी मांगे धन-दौलत, कन्या बिचारी अभागी

:-सजन कुमार मुरारका

समय के साथ चले



समय के साथ चले

सुख, दुःख, प्यार और जलन


यह दौर कब तक झेले


ख़ुद में मगन, वक़्त कैसे निकले


अपने किये  जुल़्म खुद पर


फिर भी चुप, कुछ नहीं बोले


देखना था ये  कब तक चले।


कोशिशें तो थी खत्म करने की


क़िस्मत से हल नहीं निकले


अधूरी ख्वाइस, सपने, वादे


उम्मीद के साथ ज़िन्दा रहते


कोई सचाई या कोई यादे


सच के लिबास में सजा झूठ


क्या सही, क्या गलत,


ये वक्त़  खुद तय करे


वाजिब था या गैरवाजिब


बस जिन्दगी जिये या मरे


समय की पाठशाला में उम्र भर


सफलता पाने के सहारे


पत्थर बना खड़ा ही रह गया


और मंजिल से मंजिल भटक


नासमझ दूर तक चलता रहा


जिस्म पर उम्र की परछाई


बालों में सफेदी की चमक


आँखों से ओउझिल राहें


फिर भी हताश नहीं,


नाउम्मीद कियों भले


जो सही माना मन में


और समय के साथ चले



:-सजन कुमार मुरारका

Saturday, September 8, 2012

मेघदूत



है मेघदूत
जब विरह- स्मृत-कर
श्रावन का हर दिन,
विरही के शोक से
सघन संगीत में पुंजीभूत
व्याकुलता में छिपा दर्द
अवरुद्ध अश्रुजल सिक्त कर
ताम्ब्र-कृष्ण अम्बर पर,
न जाने, कितने झंझावत
विद्युत--उत्सव से करबद्ध
हवा का तांडव दिखा कर
अंतरगूढ़-क्रन्दन से भर
प्रतिध्वनित अश्रुवाष्पयुक्त
अविरल रूप से झर  कर
नई जल-धारा बरसाकर
है मेघदूत
स्निग्ध, शीतल, स्नेहयुक्त
सागर में मिलन प्रतिबद्ध
विरह और मिलन के क्षण
एकाकार और समर्पण पूर्ण कर
देश-देशांतर में खोज कर
हर दूर प्रवासी विरही में
मिलन का सन्देश अभीसिक्त
तुम विरह से निर्मुक्त
नया जीवन संचरित कर
मेघ तुम धरा में बरस के समाते हो
तब-तुम "मेघ दूत" कहलाते हो

:-सजन कुमार मुरारका
(नोट :मेघदूत  काब्य से प्रभावित कुछ उद्गार)

वह और उनकी तस्वीर



तस्वीर से करते दीदार
वह बैठे मेरे पास ?
तस्वीर करे ना परिहास,
उनके नजर में उपहास-
मन को करता उदास,
तस्वीर से बुझे नजर की प्यास 
वह बैठे मेरे पास |
इधर उनकी तस्वीर मेरे हाथ ,
वह बैठे उस हाथ,
तस्वीर तो देती साथ ,
वह रूठे, बिन कोई बात,
साथ बैठे, फिर भी नहीं साथ |
तस्वीर से करते आलाप,
सुन लेती बिन आवाज़ चुप-चाप |
वह बैठे निस्ताप-
मेरे दर्द से नहीं कोई परिताप,
तस्वीर से मिटाते यादों का सन्ताप |
तस्वीर में देते वह मुस्कान 
देख जीना हो जाता आसन,
पास बैठे न दिखाये रुझान,
बेरुखी से जीना है मौत का फरमान !
मेरे हालात पर नहीं उनका ध्यान
आंसुओं को आँखों में नहीं स्थान |
उन से भली उनकी तस्वीर-
न दिखाये रुतवा, न कोई गरूर
बेजान-निश्चुप रहती जरुर
मरेंगे नहीं,तस्वीर से देते वह नजर,
जी लेते जिन्दगी, वह अपना लेते अगर |
तस्वीर से कियों करते दीदार |

:-सजन कुमार मुरारका

दिल-की-नज्मे




ओ मेरे दिल-ऐ-नादान
चाहत है गुलाब की
पर काँटों से भरा है दामन |
                               ओ मेरे दिल-ऐ-अरमान
                               ओंस भीगे कमल की
                               हुवा हासिल कीचढ़ का फरमान |
ओ मेरे दिल-ऐ-गुमान
रूप की तुलना चाँद की
धब्बों भरा सुन्दरता की पहचान !
                                     ओ मेरे दिल-ऐ-इमान
                                     इश्वर-अल्लाह सा मान
                                     नफरत- है फितरत, कैसे महेरवान ?
ओ मेरे दिल-ऐ-बेजुवान
स्वर-लगा बांसुरी के सुर सा
अनबोल हुवे अल्फाज, निश्चुप है अभिमान |

:-सजन कुमार मुरारका

मन-बादल सा



मन में बसे ,अंतहीन गगन सम आचार
जिसका अंत-आदी का न कोई परापार,
जब छाये दुखी -दुर्बल सा कोई बिचार,
तब लगे नीले अम्बर सा ब्यबहार
सीने में जलन,-आशाओं के प्रहार
तरंगित करते,बेदनाओं के सुप्त तार
ब्रज-बिद्युत सम भरते  संघर्षण की झंकार
तमस विकलता में आकुलता की हाहाकार !
बज्र-कम्पित धरा को झाँकी दिखलाकर,
शून्य-अम्बर से रिसे उम्मीद की जलधार
निखिल से फैलता हुआ प्राणों का आसार
वारिद के झोंके देते नव जीवन आधार
कि चिन्ता है नियति से मिला अधिकार,
मन के ऊपर" महाशून्य"का छाये विकार,
कटु अनुभव,जगाये मन में क्षुद्र विचार ,
नहीं सत्य, सिर्फ वेदना का निर्मम प्रहार
वाष्प बन उड़ जाये, क्षितिज समाये बेहतर
हर्षित इन्द्रधनुषी रंग,रंजित अँजली में भर –
नभ की विशालता में दिखे राहें बेसुमार
घूमता रहता मन बादलों के समान रह रहकर

:-सजन कुमार मुरारका


अन्दर की चिंगारी !!?!!



मेरे अन्दर एक छोटी सी चिंगारी
अति सुक्ष्म्य,भीषण अति कठोर
सीने में जल उठने को बेचैन वारी-वारी

कैसी उथल-पुथल मचे दिल में भारी
जब मन का हर कोन था विभोर
अब फ़रमानी है जग में वेवाफाई तुम्हारी |

बिन बतायें फेंक दिया जैसे_छुत की बीमारी,
कितने बार ख़ाक किया -जला कर
अरमान धूल में मिले,मिटी हसरत हमारी |


 

कितने लम्हे, कितनी रातें, बातें प्यारी-प्यारी,
किया मैंने सुपुर्दे ख़ाक पुर-जोर-
क्या तुम भूल गए?उस दिन की बात सारी |

जब बेठे थे एक साथ,पकढ़ उँगलियाँ तुम्हारी.
शर्माती-लज्जाती, चकित तुम और-!
रक्तिम-वर्ण मुख से उल्लास के हर्ष सम्भारी |

बेइन्तहा प्रेम  का एहसास, बन गई लाचारी
उपेक्षित करने के बावजूद बार-बार,
मैं रहा प्यार में अँधा,मजबूरी समझा तुम्हारी |

कि जानती ही हो तुम, जल उठेंगे हम किसी बारी !
यही नहीं मालूम कि -कब आख़िरी बार ?
जुल्म से भभक  जलेगी यह अन्दर की चिंगारी,|!|

:-सजन कुमार मुरारका

यह कैसा समय आया ?


यह कैसा समय आया ?

अचरज भरा अद्भुत समय
बुनियादि परम्परायें
रेत की तरह अब ढहे |
हम सभी ठीक तभी
टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट रहे
बैर, हिंसा और नफरतें ||
न जाने कोन आस्तीन के नीचे
जाने किसके लिये क्या ?
अन्तर्घात या हिंस्रता छुपाये,
कंधे पर हाथ रखते,
साथ-साथ चलते-चलते,
बिषधर सी चिरी हुई जीभें,
कब जहर उगल जाते!
धर्म, जाती, वर्ण और भाषा
की कोई अदृश्य आरी से
विभक्त, निर्लिप्त, और असहाय कर
बहुत महीन टुकड़ों में काट जाते ||
एक साथ मुट्ठी भींचकर खड़ें हो सकने से
हम सब कुछ पा सकते -
उन जहरीले अजगरों से
एक-एक करके नहीं, झुण्ड के झुण्ड लड़ते
सर्वस्व के लिये, अपने लिये
प्रेम, प्यार और भाईचारा से जीते |
अचरज भरा अद्भुत समय
हम सभी ठीक तभी
जागते-जागते सो रहें ||

:-सजन कुमार मुरारका

बंगला लोक-गीत का हिन्दी रूपांतरण


(१)आमार मनेर मानुष, प्राण सइ गो (भाटियाली) / बांग्ला
 (२)आमार सरल प्राणे एत दुःख दिले (भाटियाली)/ बांग्ला

    यह दोनों बंगला लोक-गीत का हिन्दी रूपांतरण का प्रयास है 

            (१)
मेरे मन का इन्सान, है प्राण-प्रिया
खोजे कंहा मिले
मैं जाऊंगा उस देश
जिस देश में इन्सान मिले।।
यदि मन का इन्सान मिलता ह्रदय के अन्दर
बसाता अति यतन कर।.।
मैं मन-सुत से माला पिरोकर
पहनता उसके गले।।
सोचा था मन- मन में, वह न जायेगा मुझे छोड़कर
हाय मेरे दुर्भाग्य चले
इसलिये धोखा देकर- चले,
यह ही था क्या मेरे भाग्य के हवाले ।।

        (२)
मेरे सरल मन को इतना दुःख दिया।।
सहे ना यौवन ज्वाला,
प्रेम न करता, था भला, है प्रिया।
दोनों नयन में नदी नाला तुमने सखी बहाया।।
आगे से मैं ना जान पाया
इतनी पाषाण होगी तुम प्रिये।
बैठा रहता मैं  एकेला, क्या होता प्रेम ना करने मे।।
तुम प्रिये रहो सुख में,
देखेंगे लोग,मर जाऊंगा मैं,
अभागे के मरणकाल में आना खबर पाने से।।

:-सजन कुमार मुरारका

नज्म बनाना है


नज्म बनाना है

अजब सा भरम मेरा, "बचकानी-सी ख़्वाहिश है "
लबों  की   थरथराहट "शब्दों"  में  दोहराना है

माशूक़ की जुल्फों के साये से,
लरज़ते काँपते दिल की धड़कन से,
मुहब्बत की नज़्म लिखने की हसरत,
एहसास के हर लम्हे से, पाना है

जैसे बाँहों में सिमटी कोई लज़्ज़त-
खामोशी से सीने में रंग भर दे,
वैसे ही सहसा,बिन आहट,
किसी ख़ास लम्हे को शब्दों में पिरोना है

प्यार की नज्म मगर जाने-
क्यूँ लाख कोशिश से भी न लिख पाते हैं ?
लगता है फुल पे मंडराती तितली
पकड़ते-पकड़ते उंगली से छुट जाती है

सोच का गुलमोहर सुर्ख़ फूलों को सहेजे तनाह सा सख़्त खड़ा है
ज़िन्दगी के हर लम्हों को दिल की नरमी से भिगोकर नज्म बनाना है

:सजन कुमार मुरारका

कर्म प्रधान या भाग्य महान


कर्म प्रधान या भाग्य महान
कभी हंसाती, कभी रुलाती, कितने गुल खिलती हैं
अज़ब दास्ताँ है भाग्य की ,फिर भी इसी की चाहत हैं

नजराना पाप-पुण्य  का , मुक़द्दर सबका होता है ;
कहते तकदीर खुली जिसकी , वही सिकंदर होता है ,

तदबीर करें कियों कोई ? भाग्य पर जब चलता है
तकदीर की चले जो तदबीर क्या काम करता है .

सन्देशा मिला "गीता"से , फल की आशा ब्यर्थ है ;
कर्म को दिल से लगाकर, विधि का निर्णय पाता है

मैं  चकित ,मेरे कर्म के पश्चयात-क्या यह तय होता है
अगर आगे से तय-सुदा, तो कर्म से उम्मीद क्या है ,

यह पहेली समझ ना आई, मन मेरा सवाल करता है .
कर्म प्रधान या भाग्य महान, कैसे इसका निदान होता है

कोई जनम से भोगे सुख, करम जरुरत कंहा होता है
कोई करम के बाद सोये भूखा-नंगा, भाग्य कंहा होता है

कैसे भी हो ये  कहना मुश्किल है , तदबीर से होता है .
कैसे भी हो ये  कहना मुश्किल है, तकदीर से होता है

मिले ग़र तकदीर -तदवीर से, नतीजा आसन होता है
अगर मिल गई तदवीर-तकदीर से काम तमाम होता है

;-सजन कुमार मुरारका

प्यार में कंहा हैं फर्क

प्यार में कंहा हैं फर्क

तब तुम्हारे साथ का नशा था
अब तुम्हारे दीदार का नशा है
तब तुम्हारे प्यार में मशगुल था
अब तुम्हारे प्यार के लिये मशगुल हैं
                 तब हमने तुम्हे चाँद सा देखा था
                 अब चाँद में सिर्फ तुम्हे देखते हैं
                 तब तुम्हारी अदायों पर मरता था
                 अब तुम्हारी अनदेखी पर मरते हैं
तब प्यार का इजहार करने जीता था
अब प्यार के इजहार के लिये जीते हैं
तब वक़्त का गुजरना ना गंवार था
अब वक़्त का ना गुजरना ना गंवार हैं
                 तब मुलाकात को तरसता था
                 अब भी मुलाकात को तरसते हैं
                 तब तुम्हारे चाहत में दीवाना था
                 अब तुम्हारे चाहत में दीवाना हैं
तब रात की तन्हाई में याद करता था
अब रात की तन्हाई में याद करते हैं
तब तेरी यादें  मेरे जीने का सहारा था
अब तेरी यादें  मेरे जीने का सहारा हैं
                  तब और अब प्यार तो प्यार ही था
                  अब और तब प्यार तो प्यार ही हैं
                  तब तुम मेरी थी, मैं तुम्हारा था
                  अब तुम तुम्हारी, पर मेरा तुम्हारा हैं

:-सजन कुमार मुरारका

मेरी शुरुआत लेखन की

मेरी शुरुआत लेखन की

यह मेरी शुरुआत थी लेखन की
दर्द, खुशी, चाहत और सोच बताने की
और सुप्त लालसा अपना नाम छपाने की
माने चाहे न माने लोग,अहमियत जताने की
बहुतों में हूँ, मैं भी कुछ, थी बात समझाने क
       ताक-झांक की तरकीब से कुछ-कुछ लिख डाला
       शब्द चुने, जोढ़-तोढ़कर,बनाया भानुमति का पिटारा
       भाव थे या नहीं,अर्थ या अनर्थ, अविवेचना की माला
      "सरस्वती" का साथ नहीं, चतुराई से काम निकला
       सृष्टा को सृजनता से कभी कस्ट होता है भला
लिख-लिख पन्ने काले हुवे,पढ़ने वाला चाहिये
समझ आये, न आये,वाह-वाह को मत तरसाइए
उतकंठा प्रवल,ख्याति-यश रातों-रात चाहिये
छंद,ताल,लय,माधुर्य और भावना को भूल जाइये
अशाय था सिर्फ और सिर्फ लेखन को सही बतलाइये
        उत्साह-आकंक्ष्य की प्रज्वलित थी भीषण ज्वाला
        नाते-रिश्तेदार, भाई-बन्धु, परिचित-पहचानवाला
        कोई बच नहीं पाया,सब का जीना हराम कर डाला
        आते-जाते,बात-बेबात सबकी सोच का निकला दिवाला
        सब कतराने लगे, मेरे जूनून का असर था अजब निराला
कुछ ने समझा पागल, कुछ ने धमकाया
कुछ ने मजबूरी से सहा, कुछ ने समझाया
कुछ ने उपदेश दिया-समय की बर्बादी बताया
वक़्त की धारा, पर मेरा लेखन रुक नहीं पाया
लगन बढ़ी, हुवे मगन, बुद्धू लोट के घर नहीं आया
       अब बारी थी काम दिखाने की, नाम फ़ैलाने की
       द्वार-द्वार घुमा, किसी ने दया न दिखाई छपाने की
      सब मागें प्रमाण-पत्र "प्रतिस्ठा और स्वीकृती की
      पूछे कंहा-कंहा हुई प्रकाशित या दुहाई मौलिकता की
     चुभन भरे सहे तीर कारण-अकारण कटु आलोचना की
:-सजन कुमार मुरारका

प्रस्तुति जाने की



मेरी ज्योति मन्द पड़ गई समय की सौगत
उम्मीदे कर्पुर बन कर उड़ गई खुसबू बिखेर
बालों में सफेदी झलकने लग गई उम्र के साथ
समझ नहीं पाया कियों रहा मैं अब तक बेखबर
न तो सरगोशियाँ और न ही अपने क्या का दर्प।
डरता हूँ कि आगे सन्नाटे का साम्राज्य लेगा असर
मुझे मौत का कोफ़्त नहीं, गुमनामी का है दर्द
कोई गिला नहीं, वेवजह इल्जाम नहीं किसी पर
मेरे पास जो बचा वक़्त,हल निकलना होगा जल्द
समय रुकता नहीं, दफ़्न करने वाले हो रहें हैं तैयार

:-सजन कुमार मुरारका

मन की गति-प्रकृति


मन की गति-प्रकृति
जल-प्रपात की जल-धारा
बहे इधर-उधर
कभी तेज, कभी मंथर
मन की गति-प्रकृति
जल भरे बादल
गरजे या बरसे
मुसलाधार या रिम-झिम
कढ़के जोर से
मन की गति-प्रकृति
स्थिर पर्बत स्तर
कठोर और,बेजान,
उपजे जिस में
पथ्थर,त्रिन या तरुवर
मन की गति-प्रकृति
निर्मल, कोमल- पवन
झंझावत या मन्द
उन्मुक्त, स्वाधीन
देती विनाश और जीवन
मन की गति-प्रकृति
सर्वभूक ज्वाला
दहन, तपन और जलन
जलाये,करे भस्म
निर्लिप्त,निर्मम जले अगन
मन की गति-प्रकृति
फ़ैली हुई भूमि या मैदान
बंजर या उपजाऊ
कांटे, फुल,खेत-खलियान
वन-उपवन या रेगिस्थान
जल,बादल और पर्वत
हवा, अग्नि और भूमि
और न जाने दिखें सर्वत्र
भिन्न रूप,और आधार-आकृति
आचार-आचरण एक सी प्रवर्ति
समभाव से समझे मति- गति
मन की दिखेगी गति-प्रकृति

:-सजन कुमार मुरारका

प्रियतमा की याद


प्रियतमा की याद

गहरा रखता है अर्थ इस खोज का स्मृति से
सूने वन में रात्रि समय ध्वनि गूंज जाती जैसे
डूबा हुआ उदासी में,याद आती बिखर-बिखर
उनका नाम, लिखें जैसे स्मृति-पट पर अक्षर
उन अक्षर को मिटाना और दुष्कर भूल जाना,
जर्जर दिल पर चिन्ह छोड़े,धुँधला-सा बेगाना
क्या करें? उन्होंने विस्मृति में समाया हम को
कैसे भुलाये उनको, न मिटने वाली यादों को
ला न सके उनके  मन में वह स्मृतियाँ प्यारी
जला न सके उन में कोमल, निर्मल चिंगारी।
उदासी और व्यथा जब मन को आकर घेरे
नाम याद कर लेते उनका दोहराते धीरे-धीरे,
कहते ख़ुद से- याद उनकी अब, जब भी आती
मेरे हृदय में बसती हैं, लाख चाहे,  न मिट पाती।
प्यार किया उनको और करता रहूँगा अब भी
दिल में उसी प्यार की लपटे धधक रही अब भी
प्यार मेरा उनको बेचैन करे,नहीं चाहता गुज़रे भारी।
मूक-मौन हूँ,अर्ज हे भगवान, उनको याद आये हमारी
हिचक तो, कभी जलन भी, मेरे मन को दहकाये
प्यार किया था सच्चे मन से, अब भुला कैसे पाये
उदास मन से मै विह्वल स्वर लेकर टहलता
जैसे धरा के प्रकाश को अँधेरा रहा निगलता,
उदास सितारे,संध्या के तारे, चिन्तन जगाके
सोये हृदय में मद्धिम सी लौ का दीपक जलाके
उन्हें ढूँढ़ने को गहरे से मन में कसक जगाये
प्रियतमा की याद तब दिल बार-बार  दिलाये

:-सजन कुमार मुरारका

हाथ-में-हाथ


हाथ-में-हाथ

कदम- कदम पर तुम्हारा साथ
गिरने को था तुमने पकड़ा हाथ
अंधाधुंध दोड़ में थका बेहताश
तुमने दिलाई  हरबार नई आश
थामे हुए हाथ में तुम्हारा हाथ
जैसे चिराग़ और रोशनी का साथ
कठिन दौर, जिन्दगी की कश्मकश
लम्बा सफ़र, निकला सरल,दिलकश
मरना देखोगी, छुटा जो तुम्हारा हाथ
तुमने मेरा जीना देखा, देकर मेरा साथ
बात थी,था कोई अहसास , या बिश्वास
सहज कट गई जिन्दगी, बिन कोई प्रयास
जानता नहीं,कियों दिया तुमने हाथ में हाथ
अब मेरा जीवन हो, मरते दम तक का साथ

:-सजन कुमार मुरारका

भूख..एक सवाल ??

भूख..एक सवाल ??

बेजान सूनी आँखें, सुख गये आँसू,नज़र धुँधलाते
दाँत कसकर भींचे, "वे" भूख को अंतढ़ीयों में दबाते
"वे" देते अभिशाप उस ख़ुदा को जिस कारन "वे" रोते
भूख से मरते,और आसमान तले  जाड़ों में खुले सोते
उम्मीदें बाँध, दुआएँ कीं, पुकारा व्यर्थ ही सोते-जागते
"वो" करे उपहास,बढ़ाया दर्द-पिछले पाप का फल बताते
ग़रीब-दुखियों के दुख को सुनमें उबासियाँ "वो " लेते
हमारे"वो" "पांच-सितारा" में  शान से बर्गर-पिज्जा खाते
भूख किया है ? हमारे "वो" अगर तरीके से जान-जाते
दुष्टता-बुराई ही है पनपी "उनमे", नैतिकता को मिटाते
दिन-रात चुन रहे सर्वनाश, अपने "वो" अभिशाप जुटाते
पाप-पुण्य की माने तो "वो" गन्दगी-खोर कीड़े से मुटाते
बजा रहे हैं द्वन्द का बिगुल अपने "वो" असमानता फैलाते
भूख किया है, हमारे "वो" अगर तरीके से जान-जाते ?

:-सजन कुमार मुरारका

सुधार सोच में


सुधार सोच में

लगे अन्दर कुछ खिसके धीरे से
दिमाग जब सुलगता गुस्से से
क्रोध का नतीजा अफ़सोस से
रोकिये इसे  अपनी सूझ-बुझ से
                           जब होता कोई अवसाद मन में
                           परेशानिया रोजमरा जिन्दगी में
                           सूझे न  आसन राह सुलझाने में
                           जवाब इसका मिले शांती-धैर्य  में
अन्दर कुछ उछले जोर से
दिल जब महकता खुशी से
संतुस्टी का नतीजा गुमान से
रोकिये इसे सोच-समझ से
                          जब होता फैसला जल्दबाजी में
                          बिन अन्जाम भले और बुरे में
                          पछताये जब डोर नहीं हाथों में
                         जवाब इसका मिले पहले सोच में
अन्दर कुछ होता चेतना से
मन जब कहता आत्मग्लानी से
किये का नतीजा जाने-अनजाने से
रोकिये कदम फिर इसे दोहराने से

:-सजन कुमार मुरारका

प्यार की ख्वाइस है मेरी भी

प्यार की ख्वाइस है मेरी भी

मुझे ख्वाइस है किसी के प्यार की
मालूम मुझे तकलीफे इस मंजर की
फिर भी चाहत है किसी दिलवर की
हाँ, मैं नाकाबिल रहूँगा, यह ईलम भी
                                                 
                    सुना था किसीके दीदार से बडने की
                    या  बिन मुलाकात थम जाने की
                    मुझे परखना है धडकने दिल की
                    जी लेते है लोग? दिल धडके या नहीं भी
नजर से नजर की आंख-मिचोली की
दिलवर की मोहब्बत भरी नजर की
सर्द, या नाजुक छबि किसी नजर की
कैसी होती यह नजर, देखना है मुझे भी
                    दिल से दिल के लगन या मिलन की
                    कियों मिल जाते,दिल.पता लगाने की
                    किसी पराये दिल को अपना दिल बनाने की
                    यह अनबूझा लेन-देन चाहे मेरा दिल भी
जज्वा कहें, जूनून कहें, राहें प्यार की
चाहत कहें, जरूरत कहें, शर्त जीने की
प्यार होता कियूं ? बात है समझने की
तभी तो  प्यार की ख्वाइस है मेरी भी

:-सजन कुमार मुरारका

दर्द निकला प्यार से


दर्द निकला प्यार से

मेरे दर्द भी अन्जाम है, मेरे नाकाम प्यार के
आखिर प्यार में दर्द ही तो मिला आप से
दर्द बहूत था दिल में, लेकिन मिला प्यार से
प्यार नहीं, आपका दर्द- "हमदर्द" है, हम से
                            दर्द को ना देखिये , उल्फत की नज़र से
                            स्वीकारा इसको हमने तोउफा समझ आपसे
                            प्यार अगर मिलता तो, मशगुल से जीते
                            दर्द मिला, तभी प्यार को याद कर जीते
प्यार नहीं मिला, न कोई गमे-सरोकार
प्यार की कशमकस, दर्द में ही बकरार
दर्द से मैं सो नहीं सकता,देखता ख्वाब
आप सोकर भी नहीं देखते प्यार का ख्वाब
                             याद ना करू कैसे वह हसीन पल ज़िन्दगी के
                             मुझको और रुलाते तेरे, कसमे-वादे प्यार के
                            लाख चाहे तो रोक नहीं सकते आसूं दर्द से
                            मिल जाता प्यार अगर, निकलते आंसू खुशी से
आंसू की कदर क्या जाने प्यार-बेखबर
दर्द निकलता प्यार से, होते जब बेक़रार
तुमको कभी रोना आया नहीं - दर्द से
प्यार "प्यार" नहीं जो गुजरा नहीं दिल से

:--सजन कुमार मुरारका

मेरी कुछ जानकारीयाँ :--


    (1)
एक रोटी कोई नहीं दे सका
उस मासूम बच्चे को
लेकिन, वह तस्वीर
लाखो में बिक गयी,
जिसमे रोटी
वो बच्चा उदास बैठा था                   (२)
                          जीवनका इम्तिहान आसान नहीं होता
                          बगैर संघर्ष कोई महान नहीं होता
                          जब तक ना पड़े हथोड़े की मार
                          पत्थर में से भी भगवन नहीं उभरता
          (३)
शीशा और रिश्ता दोनों में
सिर्फ एक ही फर्क है
वैसे तो दोनों नाजुक होते है
शीशा "गलती" से टूटता है
और रिश्ता "गलतफहमियो" से
                                                   (४)
                            "जीभ पे लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है."
                             और" जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती.."     
          (५)                                           
आंसू के गिरने की आहट नहीं होती,
दिल के टूटने की आवाज़ नहीं होती
अगर होता खुदा को एहसास दर्द का,
तो उसे दर्द देने की आदत नहीं होती                                (६)
                                      भूल जाना मुझे आसान नहीं है इतना
                                      जब भूलना चाहोगे तो पहले याद करना होगा . 

                (७)         
उम्र भर माँगते रहे जिसके लिए दुआ हम
वही आज पूछते मुझसे,हम तुम्हार हैं कौन ?              (८)
                                                      गर चल पड़ा हूँ मैं तो
                                                      ठोकरों की परवाह क्या करूं,
                                                      मंजिल ही इतनी हसीन है
      (९)                                             गिरने की परवाह क्या करूं ...                             
विडम्बना...मेरी बीवी
अपनी मर्ज़ी से मुझे जीने नहीं देती.
और..
करवा चौथ का व्रत रख कर मरने भी नहीं देती! . . .    

                                                          (१०)
                                       सवाल ये नहीं की क्या मृत्यु के बाद भी जीवन है...
                                       सवाल ये है की क्या मृत्यु तक आप जीवित हो ? 
             (११)                                   
ज़रुरतके मुताबिक ज़िन्दगी जियो,
ख्वाइश के मुताबिक नहीं ;
ज़रूरत फकीर की भी पूरी हो जाती है,
और ख्वाइश बादशाह की भी कभी अधूरी रह जाती है .   

                                                              (१२)
                                        ज़रूरत तोड़ देती है गुरूर इंसान का,
                                        ना होती कोई मज़बूरी तो हर बंदा ख़ुदा होता..!!


सजन कुमार मुरारका

भगवान का निवास

भगवान का निवास

वेद-पुराण के परिभाष
कण-कण में इश्वर का वास
जीव-निर्जीव सब में निवास
फिर स्वर्ग में, या वेकुंठ में प्रवास
मैं अज्ञानी मुझे नहीं आभास
बताये मन्दिर में श्रेष्ट भक्त जन
बताये आश्रम में संत-मुनि जन
धर्म की माने सर्वत विराजते भगवान
इश्वर के लिये फिर कियों मन्दिर निर्माण ?
क्या दीन-दू:खी के प्रभु रहेंगे विराजमान ??
प्रभु के रहने के कितने उपाय
मन्दिर-आश्रम नित नये सब बनाय
जागे कौतुहल, मन में अतीव संशय
दीन-दू:खीयों का कियों नहीं होता उपाय
भगवान रहते सब में, निराश्रय को दो वसाय ?
सहजता से भगवान अपने आप वस जाय !!

सजन कुमार मुरारका

दर्दे-ऐ-दिल बताना है


दर्दे-ऐ-दिल बताना है

खुद की बेरुखी पर
     वह अगर एक बूंद आंसू बहाते
कसम खुदा की
   हम गम का सागर पी जाते

खुद की वेवफाई पर
     वह अगर एक "आह" जताते
कसम खुदा की
      हम शर-शैया पर भी लेट जाते

खुद की अनदेखी पर
      वह अगर एक नज़र नजराते
कसम खुदा की
       हम मरते दम तक राह तकाते

खुद के जुल्मी सितम पर
      वह अगर एक अफ़सोस जताते
कसम खुदा की
       हम आग के दरिया में कूद जाते

मेरा जूनून नहीं , मेरा सरुर है
ना माकूल इम्तिहान, अब्बल आना है
उन्हें पाने का सवाल नहीं, अपना बनाना है
शिकायत उनसे नहीं, दर्दे-ऐ-दिल बताना है

सजन कुमार मुरारका

मेरा सच

मेरा सच

मैं बिसमताओं से चिन्तित
       आवाज़ करता हूँ बुलन्द
सोच से हैरान-परेशान
    वातानुकूलित कमरे में बन्द

सवाल जब मेरे पे आता
   "मैं" खुद को "हम" में मिलाता
व्यवस्था को गरियाता
     ऊँची सोच का भाव जगाता

मैं सदा हम में रहता
  फिर भी अलग-थलग हो जाता
हर सुबिधाओं पर
    गिद्ध की नजर से मडराता

फटे हाल अवस्था पर
        सहमर्मिता जताता
स्वार्थ से अन्धा
      मगर-मछ के आंसू बहता

मैं बिसमताओं से चिन्तित
       समता की दुहाई हरदम गाता
वातानुकूलित कमरे में
       साम्यवाद की कविता बनाता

सजन कुमार मुरारका