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Friday, July 27, 2012

शर्मसार हूँ, :(



मेरी बच्ची, शर्मसार हूँ, तेरा गुनाहगार हूँ
पश्च्याताप के आंसूं, अपने को कोस रहा हूँ
मैंने छोड़ी नहीं दुनिया तेरे जीने लायक
तेरी चाहत, कुछ कर दिखाने का सबक
पर दकियानूसी सोच,उदारबादी मुखोटा,
तहस नहस कर,तेरी आरजुओं का गला घोटा
मैं मजबूर था, तू हो गई थी सयानी
रिवाजों का दस्तूर, तेरी शादी थी रचानी
हम मध्यमबर्गीय जिन्हें इज्जत प्यारी
घर की बहूँ,बाहर काम करे असंभव भारी
स्नेह की चादर ओढ़कर,तेरी मासूमियत
प्यार, और स्वप्नों से मेरा था बिस्वाश्घात
कियों की समाजिक दायित्व से मन था बैचेन
बोझ लगने लगी,कानो में खनक रहे थे कंगन
घर से निकला दे दिया,पिघला नहीं निष्टुर मन
परिन्दें को जंजीर में ड़ाल दिया, देकर नया बंधन
रीत की आदिम अवस्था,अजीब सा सवाल
मान- मर्यादा हमारे लिए प्रश्न है बिशाल
इसके भीतर हम बेब्स्थाओं को गरियाते
और वर्तमान के कंधे पर सर रखकर सो जाते
पता नहीं तुम्हारे लिये या मेरे लिये यह बात
एक मौन अंतराल है, या निश्चुप आघात
पर मैं जब भी तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ
या जब कभी तुम्हारा चहेरा याद करता हूँ
मुझे महसूस होते है तुम्हारे नयन असहाय
खोज रहें उत्तर,भैया के साथ नहीं दोहराय ?
मेरा किया कसूर था ? साथ ही तो पले ?
उसके लिये  नियम कुछ अलग कैसे निकले ?
तेरी आत्मा की चीख़ों मेरे दरदे-दिल का राज है
मेरी वेवशी, तेरी माफी की मोहताज है

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