Saturday, December 4, 2010

बिदाई




बिदाई की अब बजने को है शहनाई
बिरह के सायों में यादो की परछाई
हर एक लम्हा ;हर एक स्पन्दन
बियोग के सुरों में ह्रदय का रुदन
न कर पाऊं शायेद भांवो का बर्णन
हाथ पकढ़ जो चले तेरे नहने कदम
बाबुल की दहलीज पर याद आयंगे हरदम
तेरी पुकार को तरसेगा मेरा मन
धुप छांव तले बरसेगे नयन
याद तुम बहुत आओगी
ससुराल तुम जब चलिजाओगी
सुप्रिया सुप्रिया पुकारेगा मन
आई तुम तुलसी सी मेरे आँगन में
भैया की राखी में , मैया की आंचल में
मोती सी नयनों के सीपो में
कस्तूरी सी मृग ह्रदय में
बाबुल की हर सांसो में
बंधन के कच्चे धागों में
महक रही थी छोटी सी बगिया में
छोढ़ चली बाबुल का संसार
बसाने को आपना परिवार
चली जो तुम पिया के द्वार
अश्रु -नयनो में भी ख़ुशी है अपार
बजने को है शादी की शहनाई
बिछुढ़ने को बिदाई की घढ़ी आई

Sunday, September 19, 2010

कल जो संजोया, खोकर अपना वर्तमान . . .




पढ़ लिखकर काबिल बनने घर छोढ़ चले
उजढ़ा चमन, पर है सपने उनके निराले,
नई उमीदें, नई आशाये, नई मंजिले
खुला आसमा, खुली हवांये, न कोई बंदन
सुख दुःख के जीवन मैं, एकाकीपन का स्पंदन
महक रहा है जैसे उपबन, स्वर्प लिपटे चंदन
संघर्ष है, बिराम नहीं, मरुस्थल सा जीवन ....


रह गए हम बेबाक, गुमसुम अकेले
बगिया उजढ गई, सतब्द है, देख नए उजाले
रोटी छोटी पढ गई, दो टुकरों के लाले
जिगर काटकर भी ला देते, दो निवाले

रहे वह आबाद, मिले यश, प्रतिस्ठा, सन्मान
बिछरने का गम है. पर न कोई अभिमान
वक्त हमारा बीत गया, कुछ दिनों के मेहमान
कल जो संजोया, खोकर अपना वर्तमान

Sajan.

Monday, May 10, 2010

चोट अब भी लगती हैं, पर दर्द और होता नहीं . . .


आंसू अब बहते नहीं,दिल अब रोता नहीं
गम के सागर मैं,मन अब बहता नहीं
हर गम एक सा ,नया है कुछ भी लगता नहीं
टूटे ड़ाल से पात,बसंत की हरियाली नहीं
गुलिस्तां में रोशन होते पोधे नहीं
उजढ़ा आसियाना, आसमान से डर नहीं
चोट अब भी लगती हैं, पर दर्द और होता नहीं . . .

Wednesday, May 5, 2010













पल
. . .


प्रिय ! तुम्हारे साथ के वह पल
या तुम्हारे बिना यह पल
दोनों पल, कैसे हैं ये पल ?
जला रहे हैं मुझे पल पल .
प्रिय ! तन्हाई के यह पल
या फिर मिलन के वह पल
पलक बिछाये बैठा हूँ हर पल ,
कैसे मिलेंगे फिर ये दोनों पल ?
प्रिय ! तुम याद करो वह पल
निश्चल पल में सचल नयनों के हलचल
में रोज याद करता हूँ यह पल
सचल पल में निश्चल नैनों की हलचल.
प्रिय ! यह बिरह का हर पल
या फिर मिलन का वह एक पल
पल में सिमट गया हैं अपना कल
कटे नहीं कट रहे हर एक पल !